केशवानंद भारती मामला: भारतीय संविधान का निर्णायक मोड़
न्यायमूर्ति नरीमन ने वर्ष 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय की 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने 7-6 के बहुमत से यह फैसला सुनाया था कि संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार तो है, लेकिन वह संविधान की ‘मूल विशेषताओं’ को समाप्त या कमजोर नहीं कर सकती। इस निर्णय ने संसद के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया और न्यायपालिका को यह अधिकार दिया कि वह यह जांच सके कि कोई भी संशोधन संविधान की मूल आत्मा के विपरीत तो नहीं है।
इस फैसले के तहत संविधान की बुनियादी विशेषताएं जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, विधि के शासन का सिद्धांत, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों की गारंटी आदि अटल और अपरिवर्तनीय घोषित की गईं। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया, जिसने सत्ता के अलग-अलग स्तंभों के बीच संतुलन बनाए रखने की भूमिका निभाई।
न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने वक्तव्य में कहा, “इस पुस्तक का मूल उद्देश्य यह है कि देश के नागरिक, विधिवेत्ता, और नीति-निर्माता इस बात को समझें कि मूल ढांचे का सिद्धांत केवल एक कानूनी तकनीकी अवधारणा नहीं, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र का संरक्षक है। अगर इसे खत्म करने की कोशिश की गई तो यह भारत की संवैधानिक व्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।" उन्होंने आगे जोड़ा, “अगर भविष्य में किसी समय यह सिद्धांत हटाया जाता है, कमजोर किया जाता है या राजनीतिक हितों की बलि चढ़ाया जाता है, तो हम एक बार फिर ऐसे हालात देख सकते हैं, जो भारत के सबसे काले अध्यायों में गिने जाते हैं जैसे कि जलियांवाला बाग नरसंहार।"
इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन भी उपस्थित थे। उन्होंने नरीमन की पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह पुस्तक संविधान और न्यायिक सिद्धांतों को समझने के इच्छुक सभी लोगों के लिए “अद्वितीय स्पष्टता और दूरदर्शिता से परिपूर्ण” है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल कानूनी पेशेवरों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी एक मार्गदर्शक हो सकती है, जो यह जानना चाहते हैं कि संविधान किस प्रकार उनकी स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करता है।
न्यायमूर्ति नरीमन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में संविधान के बुनियादी ढांचे को लेकर कई बहसें चल रही हैं। कुछ राजनीतिक हलकों में यह मांग उठती रही है कि संविधान में व्यापक बदलाव किए जाएं, या इसे नए सिरे से लिखा जाए। ऐसी मांगें संविधान की स्थिरता और उसमें निहित मूल्यों पर सीधा प्रहार मानी जाती हैं।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध है, जिसने इस देश को एकता के सूत्र में बांध कर रखा है। ‘मूल ढांचा’ का सिद्धांत इस अनुबंध की रक्षा करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी सरकार चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, संविधान के मूल सिद्धांतों को नहीं बदल सकती।





