मध्य प्रदेश के शिवनी जिला अस्पताल की स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 80 नवजात बच्चों की मौत हुई। इस दौरान यूनिट में कुल 1,088 बच्चे भर्ती हुए थे। अस्पताल प्रशासन ने ज्यादातर बच्चों के समय से पहले जन्म लेने और बेहद कम वजन को मौतों की वजह बताया है। वहीं, परिजनों और स्थानीय विधायक ने इलाज में देरी तथा डॉक्टरों की अनुपलब्धता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
1. 1,088 बच्चों में से 80 की मौत, अस्पताल ने दिया यह तर्क
एसएनसीयू में समय से पहले जन्मे, कम वजन वाले और सांस लेने में परेशानी से जूझ रहे नवजातों का इलाज किया जाता है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मृत बच्चों में 60 का वजन सामान्य से कम था। इनमें 44 बच्चों का वजन जन्म के समय 400 ग्राम से डेढ़ किलो के बीच था।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि कई बच्चे गंभीर हालत में दूसरे अस्पतालों से रेफर होकर आए थे। सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नावकर के मुताबिक, अस्पताल ने 500 ग्राम तक वजन वाले बच्चों का भी इलाज किया। प्रशासन ने अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान मृत्यु दर 7.4 प्रतिशत बताई और इसे 10 प्रतिशत के कथित सामान्य मानक से कम बताया। हालांकि, केवल मृत्यु दर से इलाज की गुणवत्ता तय नहीं होती।
2. परिजनों ने इलाज में देरी के लगाए आरोप
बच्चों को खोने वाले परिवारों ने समय पर इलाज न मिलने की शिकायत की है। डगरिया गांव के मनीष बरखड़े का आरोप है कि उनके करीब तीन किलो वजन के नवजात को सांस लेने में परेशानी के बाद एसएनसीयू में भर्ती कराया गया, लेकिन कुछ घंटे बाद उसकी मौत हो गई।
वहीं, जावरकाठी गांव के संजय के मुताबिक, सातवें महीने में जन्मे उनके डेढ़ किलो के बच्चे को कई दिनों तक यूनिट में रखा गया। बाद में मशीन पर शिफ्ट करने के कुछ घंटे बाद उसकी मौत हो गई। इन आरोपों की पुष्टि मेडिकल रिकॉर्ड और जांच से ही हो सकती है।
3. भाजपा विधायक के निरीक्षण के बाद जांच टीम गठित
भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन ने 10 अक्टूबर को अस्पताल का निरीक्षण किया था। उन्होंने रात में डॉक्टरों की अनुपस्थिति, मरीजों से पैसे मांगने की शिकायतों और वेंटिलेटर के लिए डॉक्टर उपलब्ध न होने जैसे मुद्दे उठाए। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने पांच डॉक्टरों की जांच टीम बनाई।
जांच के बाद तत्कालीन एसएनसीयू प्रभारी डॉ. पारस पटेरिया से जिम्मेदारी वापस ले ली गई। टीम ने ड्यूटी रोस्टर का पालन, नियमित मृत्यु समीक्षा, 48 घंटे के भीतर डेथ ऑडिट और उपकरणों की तकनीकी जांच जैसे सुझाव दिए।
4. जांच और जवाबदेही के इंतजार में 80 परिवार
सरकारी एसआरएस 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार जीवित जन्म पर 35 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 24 है। हालांकि, शिशु मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर अलग-अलग मानक हैं।
अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सभी 80 मौतों का अलग-अलग डेथ ऑडिट हुआ या नहीं, रात की ड्यूटी में डॉक्टर मौजूद थे या नहीं और जांच में मिली कमियों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए। अस्पताल को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन कम वजन और समय से पहले जन्म का हवाला देकर हर सवाल को खारिज भी नहीं किया जा सकता। इन परिवारों को दलीलों से आगे बढ़कर जवाब और पारदर्शी जांच का अधिकार है।





