प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों के विस्तार को आगे बढ़ाया। इन स्कूलों में आधुनिक सुविधाओं के साथ कक्षा 6 से 12वीं तक पढ़ाई की व्यवस्था होनी है। लेकिन झारखंड में इन स्कूलों की जमीनी स्थिति कई सवाल खड़े करती है। कहीं स्कूलों का निर्माण अधूरा है, कहीं शिक्षकों की कमी है और कहीं इमारत तैयार होने के बावजूद बच्चों की कक्षाएं शुरू नहीं हो पाई हैं।
झारखंड के एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों की बदहाल स्थिति को लेकर ThePrint की एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 91 एकलव्य स्कूल स्वीकृत हैं, लेकिन जनवरी 2026 तक इनमें से सिर्फ 51 ही संचालित हो पाए थे। बाकी 40 स्कूल निर्माणाधीन थे । वहीं, मार्च 2026 तक इन संचालित स्कूलों में कुल 8,380 विद्यार्थी नामांकित थे। यह स्थिति ऐसे समय में है, जब इन स्कूलों को दूरदराज के आदिवासी इलाकों में रहने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा और आवासीय सुविधाएं देने की अहम योजना माना जाता है।
1997-98 में शुरू हुई थी योजना, मोदी सरकार ने किया विस्तार
एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल योजना की शुरुआत 1997-98 में संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल में हुई थी। इसका उद्देश्य अनुसूचित जनजाति (ST) के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए दूरदराज के आदिवासी इलाकों में आवासीय स्कूल खोलना था। इन स्कूलों में कक्षा 6 से 12वीं तक पढ़ाई और प्रत्येक स्कूल में 480 विद्यार्थियों के रहने की क्षमता तय की गई। इनकी सुविधाओं और शिक्षा का स्तर जवाहर नवोदय विद्यालयों के समान रखने की परिकल्पना की गई। बाद में 2018-19 के बजट में मोदी सरकार ने इस योजना के विस्तार का ऐलान किया। इसके तहत उन सभी ब्लॉकों में एकलव्य स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा गया, जहां आदिवासी आबादी 50 फीसदी से ज्यादा और अनुसूचित जनजाति की कुल आबादी कम से कम 20 हजार हो। ऐसे हर ब्लॉक में 2022 तक एक स्कूल खोलने की योजना थी।
इसके बाद 15 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में 50 नए एकलव्य स्कूलों की आधारशिला रखी। योजना के विस्तार का मकसद ज्यादा से ज्यादा आदिवासी बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाना था। हालांकि, झारखंड के आंकड़े बताते हैं कि स्कूलों को मंजूरी देने और उन्हें पूरी तरह संचालित करने के बीच अब भी बड़ा अंतर है।
प्रधानमंत्री ने किया उद्घाटन, फिर भी स्कूल में नहीं लगी क्लास
ThePrint की रिपोर्ट में रांची जिले के चान्हो स्थित एकलव्य स्कूल की स्थिति सामने आई है। करीब 15 एकड़ में बने इस स्कूल का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग एक साल पहले किया था। इसके बावजूद यहां बच्चों की पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई। स्कूल में बिजली और पानी का कनेक्शन तक नहीं है। कमरों में रखी बेंचों पर धूल जम गई है, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और शौचालयों के शीशे भी क्षतिग्रस्त हैं। यानी जिस स्कूल को बच्चों के भविष्य की नई शुरुआत बनना था, वहां बुनियादी सुविधाओं का ही इंतजाम नहीं हो पाया। रिपोर्ट में 12 साल की अनुष्का कुमारी का जिक्र भी है। शुरुआत में उसका चयन नहीं हुआ था, लेकिन बाद में वेटिंग लिस्ट से उसे दाखिला मिल गया। इसके बावजूद वह स्कूल में अपनी पहली क्लास शुरू होने का इंतजार कर रही है। चान्हो और पास के एक अन्य स्कूल की कुल 60 सीटों में अब तक 36 बच्चों का दाखिला हुआ है। पास का दूसरा स्कूल अभी निर्माणाधीन है। ऐसे में दोनों स्कूलों के बच्चों को फिलहाल चान्हो परिसर में पढ़ाने की योजना है, लेकिन यहां भी कक्षाएं शुरू नहीं हो पाई हैं।
शिक्षकों की भारी कमी, 76 फीसदी पद खाली
एकलव्य स्कूलों की समस्या सिर्फ इमारतों और बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं है। शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों की कमी भी इन स्कूलों के संचालन में बड़ी बाधा है। 15 जुलाई 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, एकलव्य स्कूलों में शिक्षकों के 76 फीसदी पद खाली थे। वहीं, गैर-शिक्षण कर्मचारियों के 51 फीसदी पद रिक्त थे। एक पूरी तरह संचालित स्कूल में 31 शिक्षक और 21 गैर-शिक्षण कर्मचारी होने चाहिए। इस हिसाब से झारखंड के सभी 91 स्वीकृत स्कूल पूरी क्षमता से संचालित होते हैं, तो 2,800 से ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत होगी।
हालांकि, केंद्र की ओर से भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही गई है। NESTS के संयुक्त आयुक्त विपिन कुमार के मुताबिक, 7,267 शिक्षकों को अंतिम प्रशिक्षण के बाद देशभर के एकलव्य स्कूलों में भेजने की तैयारी थी। लेकिन भर्ती और नियुक्ति की प्रक्रिया के साथ यह भी जरूरी है कि स्कूलों में शिक्षकों की वास्तविक उपलब्धता सुनिश्चित हो।
निर्माण में देरी, केंद्र और राज्य के बीच जिम्मेदारी का सवाल
झारखंड में एकलव्य स्कूलों के निर्माण की धीमी रफ्तार भी चिंता का विषय है। ThePrint की रिपोर्ट के मुताबिक, रांची के चान्हो और बुरमू में स्कूलों से जुड़े निर्माण कार्य अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं। इनका काम क्रमशः 2022 और 2023 में शुरू हुआ था। NESTS यानी नेशनल एजुकेशन सोसाइटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स का कहना है कि जमीन से जुड़े विवाद, वन मंजूरी, बिजली-पानी की उपलब्धता और दूरदराज के इलाकों तक सड़क जैसी समस्याओं के कारण निर्माण में देरी होती है। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि उसकी जिम्मेदारी जमीन उपलब्ध कराने और जिला स्तर पर समन्वय करने तक है, जबकि स्कूलों की योजना और निर्माण का काम NESTS और उसकी एजेंसियों के जिम्मे है।
झारखंड के जनजातीय कल्याण आयुक्त कुलदीप चौधरी के मुताबिक, राज्य में NESTS का क्षेत्रीय कार्यालय नहीं होने से केंद्र और राज्य के बीच समन्वय में भी दिक्कत आती है। इस तरह स्कूलों के निर्माण में देरी की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी दलीलें हैं, लेकिन इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ रहा है जिन्हें इन स्कूलों में पढ़ना था।
जो स्कूल चल रहे हैं, वहां भी बुनियादी सुविधाओं की कमी
समस्या सिर्फ उन स्कूलों की नहीं है, जहां निर्माण या पढ़ाई शुरू होने का इंतजार है। जो एकलव्य स्कूल संचालित हैं, वहां भी बुनियादी सुविधाओं को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। साहिबगंज जिले के भोगनाडीह स्थित एकलव्य स्कूल में कक्षा 12वीं के 18 वर्षीय छात्र पांडु हांडा ने ThePrint को बताया कि स्कूल में पीने के पानी की सुविधा नहीं है। इसके अलावा स्कूल के बुनियादी ढांचे और खेलकूद के सामान में सुधार की जरूरत है। स्कूल के प्रिंसिपल रंजीत मिश्रा ने भी इन समस्याओं को लेकर जिला कल्याण विभाग को कई बार पत्र लिखा, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। यह स्थिति बताती है कि स्कूलों को सिर्फ शुरू कर देना ही काफी नहीं है। वहां पढ़ने वाले बच्चों को पीने का पानी, बेहतर इमारत, खेलकूद का सामान और जरूरी शैक्षणिक सुविधाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है।
स्कूलों की मंजूरी से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करना जरूरी
एकलव्य स्कूल योजना का मकसद आदिवासी बच्चों को उनके इलाकों में ही बेहतर शिक्षा और आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है, ताकि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। लेकिन झारखंड में स्कूलों के निर्माण, शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बताती है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अभी काफी काम बाकी है। एक तरफ नए स्कूलों की घोषणा और आधारशिला रखी जा रही है, तो दूसरी तरफ कई स्वीकृत स्कूल अब भी पूरी तरह संचालित नहीं हो पाए हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने स्कूल मंजूर हुए या कितनी इमारतें बनीं, बल्कि यह है कि उनमें कितने बच्चों को नियमित और बेहतर शिक्षा मिल पा रही है।
आखिर आदिवासी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बनाई गई योजना का लाभ उन्हें कब मिलेगा? स्कूलों का निर्माण पूरा करने से लेकर शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने तक की जिम्मेदारी तय करना अब जरूरी है।





