मुख्यमंत्री को बिना किसी जल्दबाजी के कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।"
यह मामला 9 अगस्त को सामने आया था, जब 32 वर्षीय ट्रेनी डॉक्टर की नृशंस तरीके से हत्या कर दी गई थी। पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया कि जांच में गंभीर कमियां थीं और यह जांच अधूरी थी। उनके मुताबिक, कई अन्य संदिग्धों को बचा लिया गया और जांच को सही दिशा में नहीं ले जाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई ने इस मामले में पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए, जिसके कारण अदालत ने उम्रभर की सजा सुनाई। पीड़िता के पिता ने साफ तौर पर यह आरोप लगाया कि जांच में कुछ लोगों ने जानबूझकर हस्तक्षेप किया और यह सब कुछ शुरू से ही नजर आया था।
मृतका की मां ने भी गहरी निराशा व्यक्त की और कहा, "हम स्तब्ध हैं। यह तो एक दुर्लभतम अपराध था, जहां ड्यूटी पर तैनात एक चिकित्सक का बलात्कार किया गया और उसे मार डाला गया। यह किसी साजिश का परिणाम था।" परिवार के सदस्य इसे केवल एक हत्या नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और खतरनाक अपराध मानते हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि इसमें कोई बड़ी साजिश भी शामिल है।
सीएम ममता बनर्जी ने इस फैसले पर अपनी गहरी असंतोष व्यक्त किया और इसे "निराशाजनक" बताया। उन्होंने कहा कि इस मामले को 'दुर्लभतम' अपराध के रूप में माना जाना चाहिए था और दोषी को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए थी।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर अपने संदेश में कहा, "हम इस जघन्य अपराध के लिए फांसी की सजा चाहते हैं। हम जल्द ही इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाएंगे और वहां दोषी के लिए मृत्युदंड की मांग करेंगे।" ममता बनर्जी ने इस फैसले को लेकर गहरी चिंता जताई और कहा कि ऐसे अपराधों में सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए, ताकि समाज में इस तरह के अपराधों की पुनरावृत्ति न हो।
अदालत ने मामले में दोषी को उम्रभर की सजा सुनाई और साथ ही यह भी कहा कि यह अपराध 'दुर्लभतम' श्रेणी का नहीं था। अदालत ने रॉय पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और राज्य सरकार को मृतक के परिवार को 17 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रॉय को अब सजा के रूप में उम्रभर कारावास की सजा सुनाई जाती है, जो उसके जीवन के अंत तक चलेगी। रॉय पर भारतीय दंड संहिता की धारा 64 (बलात्कार), 66 (मृत्यु का कारण बनने वाली सजा) और 103 (1) (हत्या) के तहत आरोप तय किए गए थे।
यह मामला एक बार फिर से यह सवाल खड़ा करता है कि क्या न्याय प्रणाली अपने फैसले में सख्ती और समयबद्धता से काम कर रही है या इसे लगातार प्रभावी और तेज करने की आवश्यकता है। पीड़िता के परिवार की ओर से उठाए गए सवालों और उनके दर्द को देखते हुए, यह साफ है कि वे इस मामले में पूरी न्यायिक प्रक्रिया को लेकर संतुष्ट नहीं हैं और आगे की कार्रवाई के लिए वे उच्च न्यायालय का रुख करेंगे।
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