कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने यह साबित नहीं किया कि संदेश को जानबूझकर आगे बढ़ाया गया था, जिससे सरकार की प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ। इसके अलावा, अदालत ने कहा कि यह भी साबित नहीं हुआ कि संदेश को बड़े पैमाने पर पढ़ा गया या फॉरवर्ड किया गया था, और इसलिए यह कहना कि इससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा, सिर्फ अटकलें थीं।
यह मामला 2018 का है, जब अमर सिंह को एक वॉट्सऐप संदेश मिला था, जिसमें ओबीसी और अनुसूचित जाति समुदायों के लिए अवसरों के बंद होने और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जातिवाद बढ़ने का आरोप था। इस संदेश को अमर सिंह ने एक वॉट्सऐप ग्रुप में शेयर कर दिया। हालांकि, इस पर कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, लेकिन अमर सिंह ने स्वेच्छा से सरकार को सूचित किया कि यह संदेश गलती से फॉरवर्ड हुआ था और उन्होंने इसे बाद में डिलीट कर दिया था।
इसके बाद राज्य सरकार ने उनके खिलाफ जांच शुरू की और आरोप लगाया कि इस संदेश से सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा।
कोर्ट ने पाया कि अमर सिंह के खिलाफ जांच प्रक्रिया में कई खामियां थीं और यह पूरी प्रक्रिया नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ थी। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारियों ने सिर्फ एकतरफा तरीके से जांच की, और इस प्रकार की प्रक्रिया को मनमाना और अवैध माना। अदालत ने यह भी कहा कि यदि विभाग अमर सिंह की गलती को स्वीकार कर लेता और इसे हल्के तरीके से सुलझाता, तो उन्हें कोई बड़ा दंड नहीं मिलता। इसके बजाय, विभाग ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की, जो कि अनुचित थी।
कोर्ट ने अमर सिंह की ईमानदारी को अहमियत दी, क्योंकि उन्होंने गलती स्वीकार की और किसी भी नुकसान को कम करने के लिए तुरंत कदम उठाए। अदालत ने कहा कि अमर सिंह के खिलाफ केवल चेतावनी दी जानी चाहिए थी, और उनके कार्यों में कोई दुर्भावना नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा कि उन्हें सेवा रिकॉर्ड में कोई प्रतिकूल प्रविष्टि या फटकार नहीं दी जानी चाहिए थी, क्योंकि इस तरह की हल्की सजा उनके लिए पर्याप्त होती।
अंततः, कोर्ट ने अमर सिंह को राहत दी और उनके बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि वह उन्हें सभी संबंधित लाभों के साथ बहाल करे।
अदालत ने यह भी कहा कि अमर सिंह को हल्की सजा दी जानी चाहिए, जैसे कि चेतावनी, और किसी अन्य प्रकार का दंड उचित नहीं होगा। अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि गलतियों को स्वीकारने और बिना किसी नकारात्मक उद्देश्य के की गई गलती को हल्के ढंग से सुलझाना अधिक न्यायसंगत होता है, बजाय इसके कि किसी अधिकारी को पूरी तरह से बर्खास्त कर दिया जाए।
यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों और उचित जांच प्रक्रिया की महत्ता को भी उजागर करता है, और यह दर्शाता है कि नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करते हुए किसी भी मामले में त्वरित और निष्पक्ष निर्णय लिया जाना चाहिए।
Read This Also:- ब्राह्मण महासभा में पहुंचे HC जज, बोले- आंबेडकर ने ब्राह्मणों के योगदान की खुद तारीफ की थी!
Read This Also:- ब्राह्मण महासभा में पहुंचे HC जज, बोले- आंबेडकर ने ब्राह्मणों के योगदान की खुद तारीफ की थी!





