अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस साल ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं के बीच सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया था। लेकिन कुछ महीनों बाद दोनों नेताओं को अपने-अपने देशों में मतदाताओं के फैसले की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है, जबकि इजराइल में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सका।
अमेरिका में ट्रंप की पार्टी को झटका अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच होने वाले महत्वपूर्ण चुनाव होते हैं। इनका सीधा असर राष्ट्रपति की संसद में राजनीतिक ताकत पर पड़ता है। स्क्रिप्ट के अनुसार डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों में बढ़त हासिल की है।
राष्ट्रपति ट्रंप भले ही सीधे इन चुनावों में उम्मीदवार नहीं थे, लेकिन नतीजे उनकी नीतियों और नेतृत्व पर जनमत के तौर पर देखे जा रहे हैं। इससे आने वाले समय में कानून और सरकारी खर्च से जुड़े फैसलों पर ट्रंप प्रशासन को विपक्ष के साथ समझौता करना पड़ सकता है।
भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का रुख डेमोक्रेट्स की ओर चुनाव में भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं का रुख भी महत्वपूर्ण रहा। स्क्रिप्ट में उद्धृत कार्नेगी एंडोमेंट और युगव के सर्वे के मुताबिक 62 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी नागरिकों ने अपने क्षेत्र के डेमोक्रेट उम्मीदवार को वोट देने की इच्छा जताई, जबकि रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए यह आंकड़ा 19 प्रतिशत था।
इसके बावजूद भारतीय मूल के कुछ बड़े कारोबारी दानदाताओं ने रिपब्लिकन से जुड़े संगठनों को अधिक चुनावी चंदा दिया। रिपोर्ट के अनुसार 2025 के बाद भारतीय-अमेरिकी दानदाताओं ने रिपब्लिकन से जुड़े दलों को 1 करोड़ 58 लाख डॉलर से अधिक और डेमोक्रेटिक पक्ष को करीब 37 लाख डॉलर दिए। यानी दानदाताओं और आम मतदाताओं की राजनीतिक पसंद में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
इजराइल में नेतन्याहू के सामने बहुमत की मुश्किल इजराइल के 120 सदस्यीय नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है। स्क्रिप्ट के अनुसार नेतन्याहू और उनके सहयोगियों को 53 सीटें मिलीं, जबकि विपक्ष को 48 और अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को 19 सीटें मिलीं। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन अकेले सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा सकी।
इसका मतलब है कि नेतन्याहू की सत्ता का भविष्य गठबंधन वार्ता और दूसरे राजनीतिक गुटों के समर्थन पर निर्भर करेगा।
ईरान नीति से घरेलू राजनीति तक स्क्रिप्ट में मार्च की एक रॉयटर्स रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि ईरान पर हमले से पहले ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सत्ता परिवर्तन की संभावना पर चर्चा हुई थी। अब राजनीतिक तस्वीर उलटती दिख रही है—विदेश में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं तलाशने वाले दोनों नेताओं को अपने ही देशों में राजनीतिक समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
इन घटनाओं को दुनिया भर में दक्षिणपंथी राजनीति के सामने बढ़ती चुनौतियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। महंगाई, रोजगार, आवास और जीवन-यापन की लागत जैसे मुद्दे अब मतदाताओं के लिए अहम बनते जा रहे हैं।





