सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में दो बच्चों के नियम को बनाए रखने के औचित्य पर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बनाए गए इस नियम का प्रभाव अब समाप्त हो चुका है, क्योंकि भारत में प्रजनन दर घट रही है। बेंच ने महाराष्ट्र के एक सरपंच को तीसरे बच्चे के आधार पर अयोग्य ठहराए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वे राज्य के नियमों की तार्किकता की जांच करने को तैयार हैं और इस मामले में वकील रुक्मिणी बोबडे से एमिकस क्यूरी के रूप में मदद मांगी।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने 2003 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा, "क्या यह नीति वास्तव में प्रभावी है? हमें जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। देश में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं।"
आबादी और प्रजनन दर के बदलाव
कोर्ट ने बताया कि 2003 से लेकर अब तक भारत के जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान में, देश का कुल प्रजनन दर 1.7 के आसपास है, और कुछ राज्य जैसे केरल और तमिलनाडु में यह कई स्कैंडिनेवियाई देशों से भी कम है। बेंच ने कहा, "जब कई राज्य अब गिरती प्रजनन दर से जूझ रहे हैं, तो आबादी में कमी लाने के लिए इस नीति को बनाए रखना पूरी तरह से अव्यावहारिक हो सकता है।"
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने यह भी कहा कि तीन बच्चों का होना अब सामान्य बात हो गई है। उन्होंने बताया, "आपकी और मेरी पीढ़ी में, तीन बच्चों की संख्या बहुत कम थी, लेकिन अब यह सामान्य हो गया है। इस नीति का प्रभाव समाप्त हो चुका है। इसे तत्काल प्रभाव से हटाया जाना चाहिए।"
मंगला इंगले की याचिका की सुनवाई
यह टिप्पणी पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिन्होंने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के धारा 14(1)(j-1) के तहत उन्हें अयोग्य ठहराए जाने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। यह नियम दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों को पंचायत सदस्य या सरपंच के चुनाव लड़ने से रोकता है। इंगले बुलढाणा जिले की काकोडा ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गई थीं, लेकिन उनके तीसरे बच्चे के मामले में एक शिकायत के कारण उन्हें अयोग्य ठहराया गया।
अतिरिक्त कलेक्टर ने अक्टूबर 2024 में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया, जबकि उनकी अपील को खारिज कर दिया गया। बाद में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने अगस्त 2025 में इस फैसले को सही ठहराया, यह मानते हुए कि अधिकारियों ने जिस जन्म प्रमाण पत्र पर भरोसा किया था, वह एक सार्वजनिक दस्तावेज था और इंगले इसे चुनौती देने में असफल रहीं।
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