मामला एक सरकारी कर्मचारी से जुड़ा था, जो सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी उपलब्ध कराने के अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा था। आरोपी हरि नंदन सिंह ने RTI अधिनियम के तहत अतिरिक्त कलेक्टर से जानकारी मांगी थी। जब उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो उन्होंने अपील दायर की।
अपील प्रक्रिया के तहत शिकायतकर्ता को आरोपी के निवास पर जाकर सूचना सौंपनी पड़ी।
इस दौरान, आरोपी ने न केवल उनके धर्म का हवाला देते हुए कथित रूप से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, बल्कि उन पर आपराधिक बल प्रयोग करने का भी आरोप लगा। इसके बाद आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 298 (धार्मिक भावनाएं आहत करना), 504 (शांति भंग के इरादे से अपमान), 506 (आपराधिक धमकी), 353 (लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला) और 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी द्वारा दिए गए बयान "निस्संदेह खराब स्वाद के" हैं, लेकिन यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए, IPC की धारा 298 के तहत अपराध कायम नहीं रह सकता।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
धारा 353: आरोपी द्वारा कोई हमला या बल प्रयोग नहीं किया गया था, इसलिए यह लागू नहीं होता।
धारा 504: आरोपी की भाषा से शांति भंग होने की आशंका नहीं थी, इसलिए यह भी लागू नहीं होता।
धारा 298: धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला नहीं बनता।
अदालत ने सभी आरोपों से आरोपी को मुक्त कर दिया।
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