यह मामला सितंबर 2010 का है, जब महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में स्थित बागला होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज के दो छात्र वैभव और मंगेश कॉलेज से एक साथ निकले थे। दोनों अक्सर साथ आते-जाते थे। 16 सितंबर को वे कॉलेज से मंगेश के स्कूटर पर निकले, एक चाय स्टॉल पर रुके और फिर वैभव के घर चले गए।
उसी शाम मंगेश घर नहीं लौटा, तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई। अगले दिन उसका शव बरामद हुआ, जिसके बाद पुलिस ने वैभव को मुख्य आरोपी बनाया, क्योंकि वह मंगेश के साथ आखिरी बार देखा गया था।
पुलिस ने अदालत को बताया कि वैभव ने रिवॉल्वर से मंगेश की हत्या कर दी थी। वहीं, वैभव ने दावा किया कि मंगेश ने गलती से खुद को गोली मार ली थी। उसने स्वीकार किया कि डर के कारण उसने घटनास्थल को साफ किया और शव को हटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हत्या के पीछे कोई भी ठोस और सुसंगत मकसद अभियोजन द्वारा साबित नहीं किया गया। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और शस्त्र अधिनियम के अंतर्गत वैभव की सजा रद्द कर दी। हालांकि, पीठ ने साक्ष्य मिटाने के आरोप में IPC की धारा 201 के तहत उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा और उसे दी गई सजा भी मान्य की, जो वह पहले ही काट चुका है।





