भारतीय मीडिया जगत में इन दिनों मुख्यधारा के समाचार चैनलों और स्वतंत्र डिजिटल मीडिया के बीच का फर्क और बहस का मुद्दा गहराता जा रहा है। हाल ही में सामने आए घटनाक्रमों में यह बात खुलकर सामने आई है कि कैसे टेलीविजन मीडिया गंभीर राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से ध्यान भटकाकर हल्के या एआई-आधारित (Artificial Intelligence) कंटेंट्स पर ज्यादा जोर दे रहा है।
एक तरफ जहां देश में चुनावी पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की भूमिका और अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ सीमाई झड़पों जैसे संवेदनशील मुद्दे गर्माए हुए हैं, वहीं मुख्यधारा के चैनलों पर एआई कैरेक्टर्स के जरिए काल्पनिक या मनोरंजन आधारित इंटरव्यू दिखाए जा रहे हैं। आलोचकों और स्वतंत्र पत्रकारों का कहना है कि गंभीर मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं। जब देश के युवा, छात्र और विभिन्न संगठन सड़कों पर उतरकर अपने अधिकार मांग रहे हैं, तब टीवी मीडिया इन आवाजों को दबाने या नजरअंदाज करने का काम कर रहा है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित जेफरी एपस्टीन फाइल्स और उससे जुड़े शक्तिशाली लोगों के संबंधों पर मीडिया की चुप्पी पर भी सवाल उठाए गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के गलियारों से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में मुख्यधारा के पत्रकारों का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है। दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया ने इन तमाम बंदिशों को तोड़ते हुए जमीन पर हो रहे संघर्षों, विरोध प्रदर्शनों और प्रशासनिक लापरवाहियों को जनता के सामने बेबाकी से रखा है।
अरुणाचल प्रदेश में सीमाई सुरक्षा और स्थानीय निवासियों की चिंताओं को लेकर भी सरकार और मीडिया के दावों की पोल खुली है। स्थानीय लोगों और सुरक्षा अधिकारियों के बयानों में अंतर ने यह साबित कर दिया है कि जमीनी हकीकत को छिपाने की कोशिशें की जाती हैं। ऐसे समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और स्वतंत्र क्रिएटर्स ही जनता की सच्ची आवाज बनकर उभर रहे हैं, जो सत्ता से सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने का काम कर रहे हैं।
इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर- https://youtu.be/2MvCot-9Dyk?si=DqtF3UsQZlDMcFwD





