संगठन ने केंद्र सरकार पर आदिवासी समुदायों के खिलाफ 'नरसंहार युद्ध' छेड़ने का आरोप लगाया है। उन्होंने नागरिक क्षेत्रों में सैन्य बलों के इस्तेमाल को असंवैधानिक करार दिया है और साथ ही बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों, छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से शांति वार्ता को बढ़ावा देने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का आग्रह किया है। माओवादियों ने शांति वार्ता की प्रक्रिया को गति देने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का भी अनुरोध किया है।
माओवादियों ने शांति वार्ता के प्रति अपनी तत्परता को जाहिर करते हुए कहा कि यदि सरकार उनकी पूर्व शर्तों पर सहमत होती है तो वे बातचीत में भाग लेने के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि जैसे ही सरकार सैन्य अभियान बंद करेगी, वे युद्धविराम की घोषणा करेंगे। यह अपील ऐसे समय पर आई है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दो दिन बाद छत्तीसगढ़ के दौरे पर आ रहे हैं।
चार अप्रैल को रायपुर पहुंचने के बाद, वह राज्य के प्रमुख नेताओं और अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।
5 अप्रैल को शाह बस्तर के दंतेवाड़ा जिले का दौरा करेंगे, जहां वह बस्तर पंडुम महोत्सव के समापन समारोह में शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त, वह एंटी-नक्सल अभियान के ऑपरेशन कमांडरों के साथ संवाद करेंगे, ताकि माओवादी गतिविधियों के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कदम उठाए जा सकें। इस दौरान छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहती है। उन्होंने कहा कि न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार की मंशा है कि वे हिंसा को बढ़ावा दें। राज्य सरकार का उद्देश्य है कि नक्सली मुख्य धारा में लौटें और समाज में सकारात्मक योगदान दें।
विजय शर्मा ने यह भी कहा कि राज्य सरकार की योजना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों का समुचित प्रबंधन किया जाए, लेकिन यह तब तक होगा जब तक स्थानीय आदिवासी समुदाय को खतरा न हो। सरकार का उद्देश्य केवल शांति बहाल करना और इन क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा देना है।
Read This Also:- राज्यसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पर शक्ति परीक्षण, सरकार के लिए कितनी मुश्किल होगी राह?
Read This Also:- राज्यसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पर शक्ति परीक्षण, सरकार के लिए कितनी मुश्किल होगी राह?





