केंद्रीय मंत्री ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "जिस चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान की प्रक्रिया आयोजित की, उसी के दम पर तेजस्वी यादव और उनके परिवार के लोग विधायक और सांसद जैसे बड़े पदों पर आसीन हुए। अब उसी चुनाव आयोग को तेजस्वी द्वारा कैंसर कहना निंदनीय और शर्मनाक है। अगर तेजस्वी जी को सचमुच लगता है कि यह संस्था कैंसर है, तो उन्हें और उनके परिवार के सभी सदस्यों को इस 'कैंसर प्रोडक्ट' की पहचान स्वीकार कर तत्काल राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।" मांझी का यह बयान तेजस्वी के खिलाफ उनकी नाराजगी और गहरे आक्रोश को साफ तौर पर जाहिर करता है।
दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने एक प्रमुख टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि "लोकतंत्र और संविधान के लिए चुनाव आयोग एक खतरनाक कैंसर बन गया है।"
तेजस्वी ने आगे कहा कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस संवैधानिक संस्था को पूरी तरह से अपने कब्जे में कर लिया है और इसे अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रही है। उनका आरोप था कि विपक्षी दलों की ओर से उठाए गए सवालों और शिकायतों को चुनाव आयोग कभी गंभीरता से नहीं लेता, जिससे उसकी निष्पक्षता पर गहरे संदेह पैदा हो गए हैं। इससे पहले भी तेजस्वी ने सार्वजनिक मंचों पर यह कहते हुए चुनाव आयोग की आलोचना की थी कि यह संस्था बीजेपी के लिए महज एक "चीयरलीडर" की तरह काम कर रही है, जो उसके इशारों पर चल रही है।
तेजस्वी ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उस चुनाव के परिणामों के दिन चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व और संदिग्ध तरीके से एक ही दिन में तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनका आरोप था कि शाम के वक्त मतगणना को अचानक रोक दिया गया, जबकि उस समय तक महागठबंधन जीत की ओर बढ़ रहा था। फिर देर रात 2 बजे तक परिणाम घोषित किए गए, जिसमें कई सीटों पर धांधली और बेईमानी की गई।
तेजस्वी ने दावा किया कि उनके गठबंधन के कई उम्मीदवार जीत की कगार पर थे, लेकिन सुनियोजित साजिश के तहत उन्हें हराया गया। उन्होंने कहा कि इस धांधली के पुख्ता सबूत कोर्ट में पेश किए गए, लेकिन वहां से भी कोई न्याय नहीं मिला और न ही कोई कार्रवाई हुई। उनका कहना था कि यह सब चुनाव आयोग की मिलीभगत और पक्षपात का परिणाम था, जिसने लोकतंत्र को कमजोर करने का काम किया।
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