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इलाहाबादिया विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, केंद्र सरकार को अश्लीलता रोकने के लिए नियम बनाने के निर्देश

यह मुद्दा यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया के खिलाफ अश्लीलता के आरोपों में दर्ज कई एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान |

इलाहाबादिया विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, केंद्र सरकार को अश्लीलता रोकने के लिए नियम बनाने के निर्देश
फोटो: Ranveer Allahabadia
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (3 मार्च) को यूट्यूब और अन्य डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित हो रही अश्लील सामग्री को विनियमित करने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया। यह मुद्दा यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया के खिलाफ अश्लीलता के आरोपों में दर्ज कई एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।

नियम की जरूरत, लेकिन सेंसरशिप नहीं: सुप्रीम कोर्ट


न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि वह इस विषय पर एक मसौदा विनियमन तैयार करे और उसे सार्वजनिक डोमेन में रखे ताकि सभी हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए जा सकें। पीठ ने अपने आदेश में कहा: "ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण के संबंध में जो समाज के नैतिक मानकों के अनुरूप नहीं हैं, कुछ नियामक उपायों की आवश्यकता हो सकती है। हमने भारत के विद्वान सॉलिसिटर जनरल को इस विषय पर विचार-विमर्श करने और ऐसे उपायों का सुझाव देने के लिए कहा है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार पर प्रतिबंध न लगाएं, बल्कि अनुच्छेद 19 के तहत निर्धारित मौलिक अधिकारों के दायरे में रहकर प्रभावी हों।"

रणवीर इलाहाबादिया के शो पर उठे सवाल


यह मामला यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया द्वारा "इंडियाज गॉट लेटेंट" शो में की गई विवादित टिप्पणियों से संबंधित है। उनके खिलाफ कई राज्यों में अश्लीलता के अपराध में एफआईआर दर्ज की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह पहले इस याचिका पर नोटिस जारी करते हुए शो में इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी असहमति जताई थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि कोर्ट सेंसरशिप लागू करने की दिशा में नहीं बढ़ना चाहता, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह अनियंत्रित भी नहीं छोड़ा जा सकता। 

उन्होंने कहा,  "हम कोई ऐसी नियामक व्यवस्था नहीं चाहते जो सेंसरशिप की ओर ले जाए... लेकिन यह पूरी तरह स्वतंत्र मंच भी नहीं हो सकता। सिर्फ इसलिए कि किसी के व्यावसायिक हित जुड़े हैं, इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी कुछ भी कह सकता है। हास्य एक ऐसी चीज होनी चाहिए जिसका पूरा परिवार आनंद ले सके, जिससे किसी को भी शर्मिंदगी न हो। गंदी भाषा का प्रयोग करना कोई प्रतिभा नहीं है।"

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी न्यायालय की चिंताओं से सहमति जताई और कहा कि डिजिटल मीडिया के लिए एक संतुलित कार्यप्रणाली तैयार किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "स्वतंत्र अभिव्यक्ति की रक्षा की जानी चाहिए, लेकिन अश्लीलता और विकृतियां हमारे बच्चों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को किसी को हंसाने के लिए अश्लीलता का सहारा लेना पड़ता है, तो इसका मतलब है कि वह एक अच्छा कॉमेडियन नहीं है।" सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपेक्षा की है कि वह डिजिटल मीडिया और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित कंटेंट को विनियमित करने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करे। सरकार इस संबंध में हितधारकों की राय लेने के बाद एक मसौदा प्रस्ताव तैयार करेगी, ताकि डिजिटल स्पेस में अश्लीलता और अनुचित सामग्री को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे।

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