इसके विरुद्ध उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
याची के वकील ने दलील दी कि उसका मुवक्किल वैध वीजा के साथ भारत आया था और अब यदि उसे जबरन श्रीलंका भेजा गया तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सजा पूरी होने के बाद उसे बिना किसी कानूनी निर्वासन प्रक्रिया के लगभग तीन वर्षों से हिरासत में रखा गया है, जो न्यायसंगत नहीं है। साथ ही यह भी बताया गया कि याची की पत्नी और बच्चे पहले से ही भारत में रह रहे हैं और वह उनके साथ रहना चाहता है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि भारत में बसने का अधिकार केवल देश के नागरिकों को ही प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार भारत में स्वतंत्र रूप से बसने का अधिकार किसी भी विदेशी नागरिक को नहीं है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याची को भारत छोड़ने का आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि यदि उसे अपने देश में जान का खतरा है, तो वह किसी अन्य देश में शरण मांग सकता है। यह भारत सरकार का दायित्व नहीं है कि वह प्रत्येक शरणार्थी को देश में रहने की अनुमति दे, विशेषकर तब जब वह व्यक्ति सुरक्षा से संबंधित गंभीर मामलों में दोषी ठहराया जा चुका हो।
इससे पहले भी अदालत ने रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका विदेशी शरणार्थियों को भारत में बसने की स्वत: अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। यह निर्णय भारत की सीमित संसाधनों, राष्ट्रीय सुरक्षा, और आंतरिक जनसंख्या दबाव को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
यह मामला भारत की शरणार्थी नीति, मानवाधिकार, और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को उजागर करता है। अदालत का यह निर्णय इस बात पर जोर देता है कि मानवता के आधार पर सहायता दी जा सकती है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति भारत में अनिश्चितकाल तक रह सकता है, विशेषकर तब जब वह कानूनी रूप से दोषी करार दिया जा चुका हो।





