वहीं, भारत के संदर्भ में, पाकिस्तान ने हमेशा अपनी मुश्किलों को हल करने के लिए भारत से तनाव बढ़ाने का तरीका अपनाया। भारत और पाकिस्तान के बीच इस तनाव की शुरुआत 1971 के युद्ध के बाद हुई थी, जब पाकिस्तान की हार के बाद उसे यह अहसास हुआ कि सीधे युद्ध के माध्यम से भारत से जीतना मुश्किल है। पाकिस्तान ने इस हार के बाद एक नई रणनीति अपनाई, जिसमें उसने छद्म युद्ध या पीठ पीछे वार की नीति को स्वीकार किया। पाकिस्तान ने इसे अपने राष्ट्रीय हितों के लिए स्वीकार किया और इसे एक औपचारिक नीति के रूप में अपनाया, जिसके तहत आतंकवाद को एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया।
पाकिस्तान की यह रणनीति "ब्लीड इंडिया विद थाउजेंड कट्स" के नाम से जानी जाती है, जिसका उद्देश्य भारत को एक हजार स्थानों पर जख्म देना था। इस नीति को पाकिस्तान के तत्कालीन शासक जनरल जिया उल हक ने 1977 में अपनाया था, जो उनके शासनकाल में पूरे पाकिस्तान में इस्लामिक चरमपंथ को बढ़ावा देने की कोशिशों का हिस्सा था। जिया उल हक के शासन में पाकिस्तान ने यह नीति अपनाई कि भारत को आतंकवाद के माध्यम से कमजोर किया जाए, ताकि पाकिस्तान को अपनी मर्जी के मुताबिक भारत से कश्मीर प्राप्त हो सके।
भारत से कश्मीर छीनने के लिए पाकिस्तान ने सीमा पार आतंकवाद का सहारा लिया।
पाकिस्तान ने आतंकवादियों को कश्मीर की सीमा में भेजा और इसका यह दावा किया कि यह कश्मीरी लोगों का स्वतंत्रता संघर्ष है और पाकिस्तान का इसमें कोई हाथ नहीं है। हालांकि, वास्तविकता तब सामने आई जब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस बात का खुलासा किया कि पाकिस्तान इस प्रकार की गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा था।
1980 के दशक के अंत में पाकिस्तान ने अपनी इस नीति को और भी अधिक सशक्त किया और इस्लामिक चरमपंथ के प्रचार के लिए संगठन बनाए। इनमें सबसे प्रमुख संगठन था लश्कर-ए-तैयबा, जो जमात-उद-दावा से जुड़ा हुआ था। जमात-उद-दावा का लक्ष्य पूरे दक्षिण एशिया में इस्लामिक शासन स्थापित करना था, जिसमें भारत भी शामिल था। इसके अलावा, दावत-उल-इरशाद की स्थापना हाफिज सईद और जफर इकबाल जैसे लोगों ने की थी, जो इस्लामिक चरमपंथ के प्रचारक थे।
हाफिज सईद वही व्यक्ति है जिसने 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की साजिश रची थी।
लश्कर-ए-तैयबा, जो जमात-उद-दावा की सशस्त्र विंग के रूप में उभरा था, ने भारत के कश्मीर सहित अन्य हिस्सों में आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान से सशस्त्र समर्थन प्राप्त किया। पाकिस्तान की सरकार और आईएसआई ने लश्कर-ए-तैयबा और अन्य जिहादी संगठनों को फंडिंग और अन्य सहायता प्रदान की। इन संगठनों ने भारतीय नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ कई बड़े हमले किए, जिनमें कश्मीर के आतंकी हमले और 2001 का संसद हमला भी शामिल हैं।
इसके अलावा, पाकिस्तान ने इन संगठनों के माध्यम से भारत को कमजोर करने की रणनीति अपनाई और आतंकवाद को एक औपचारिक नीति के रूप में स्वीकार किया। भारत ने इस आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए अपने सुरक्षा बलों को मजबूत किया और अमेरिका जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाया, लेकिन पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं आया।
भारत ने पाकिस्तान से कई बार आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाने की अपील की, लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा इसे नकारा किया और अपनी नीति पर अडिग रहा।
पाकिस्तान का यह आतंकवाद और इस्लामिक चरमपंथ फैलाने का अभियान न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच यह तनाव लगातार बना हुआ है, और यह पाकिस्तान की अपनी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर प्रभाव डालता है। इसके बावजूद, पाकिस्तान की सरकार और आईएसआई इन जिहादी संगठनों का समर्थन करती रही है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान की नीति में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया है।





