विवादास्पद विधेयक पर चर्चा के दौरान ओवैसी ने महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास का संदर्भ देते हुए कहा कि जब गांधीजी ने वहां के नस्लीय भेदभावपूर्ण कानूनों को अस्वीकार किया था, तब उन्होंने वही किया था जो आज वह स्वयं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "अगर कोई इतिहास का अध्ययन करेगा, तो उसे पता चलेगा कि महात्मा गांधी ने श्वेत दक्षिण अफ्रीका के अन्यायपूर्ण कानूनों के बारे में क्या कहा था। उन्होंने कहा था, 'मेरी अंतरात्मा इसे स्वीकार नहीं कर सकती,' और उन्होंने उस कानून की प्रति फाड़ दी थी।"
ओवैसी ने उसी तर्ज पर विधेयक की प्रति फाड़ते हुए कहा, "गांधी की तरह, मैं भी इस कानून को फाड़ रहा हूं, क्योंकि यह असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है। भाजपा सरकार मंदिर और मस्जिद के नाम पर देश में नफरत और विभाजन को बढ़ावा देना चाहती है। यह विधेयक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनकी धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सीधा हमला है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं इस विधेयक की कड़े शब्दों में निंदा करता हूं और सरकार से अनुरोध करता हूं कि वे इसमें मेरे प्रस्तावित 10 संशोधनों को स्वीकार करें।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और स्वायत्तता को कमजोर करेगा, जिससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं प्रभावित होंगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने और उनकी संपत्तियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है।
इस दौरान लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। ओवैसी के इस कृत्य की भाजपा नेताओं ने कड़ी आलोचना की, जबकि विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने उनके इस विरोध को समर्थन भी दिया।
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