एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) का गठन 18 अक्टूबर 2010 को किया गया था, जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। यह एक वैधानिक और विशिष्ट निकाय है, जो भारत में पर्यावरण से संबंधित मामलों को देखता है। भारत पहला ऐसा विकासशील देश है, जिसने ऐसे ट्रिब्यूनल की स्थापना की है। वहीं, दुनिया में भारत ऐसा करने वाला तीसरा देश बन गया है।
रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
15 मई को प्रकाशित नेचर सस्टेनेबिलिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 60 लाख़ पेड़ों का काटे जाना पर्यावरण के नज़रिये से चिंता का विषय है। भारत ने यह पेड़ साल 2018 से 2022 के बीच खोये हैं। संख्या का आकलन रिज़ॉल्यूशन उपग्रह इमेजरी के दृश्यों पर आधारित है। पूर्वी मध्य प्रदेश और इंदौर जैसे क्षेत्रों को छोटे हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया गया है, यानी अगर यहाँ ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में यह बड़े हॉटस्पॉट के रूप में शामिल हो सकते हैं।
एनजीटी ने क्या कहा
एनजीटी ने कहा कि रिपोर्ट से साफ़ संकेत मिल रहा है कि पर्यावरण के मानदंडों का पालन नहीं किया जा रहा है। रिपोर्ट में पर्यावरण से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है। भारत का वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 वनों की सुरक्षा और संरक्षण का प्रावधान करता है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि रिपोर्ट को पढ़ने पर ऐसा लग रहा है कि वनों की सुरक्षा को नुक़सान पहुंचा है। अधिनियम में निजी भूमि पर भी वनों की कटाई के लिए विशेष प्रावधान है, यानी निजी भूमि पर भी वनों की कटाई को बिना इज़ाजत के नहीं काटा जा सकता है।
ग़ौरतलब है कि साल 2023 में सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में कुछ संशोधन करके नया अधिनियम यानी वन (सरंक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 पास किया था। सरकार ने इसमें नया प्रावधान यह किया था कि वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने के लिए अधिनियम के दायरे से निजी जोत की भूमि को हटा दिया गया। सरकार का तर्क है कि इससे हरित क्रान्ति को बढ़ावा मिलेगा, और पर्यावरण में मौजूद कार्बन में भी सुधार किया जा सकेगा।





