इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जयशंकर ने 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने का उल्लेख किया और कहा, "यह पहला कदम था। इसके बाद कश्मीर में विकास, आर्थिक सुधार और सामाजिक न्याय बहाल करना दूसरा कदम रहा। चुनाव कराना, जिसमें भारी मतदान हुआ, तीसरा कदम था। अब हम उस अंतिम चरण का इंतजार कर रहे हैं, जब कश्मीर का वह हिस्सा हमें वापस मिलेगा, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। जब यह होगा, तो मैं आपको आश्वासन देता हूं कि कश्मीर समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।"
मानवाधिकारों पर भी उठे सवाल
चर्चा की मेजबान, चैथम हाउस की मुख्य कार्यकारी अधिकारी ब्रॉनवेन मैडॉक्स ने कश्मीर के साथ-साथ मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठाए। इस संदर्भ में उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स में हुई एक बहस का जिक्र किया, जहां लेबर सांसद सारा स्मिथ ने "जम्मू और कश्मीर में मानवाधिकारों के लिए सरकार का समर्थन" विषय पर चर्चा की थी।
जब जयशंकर से पूछा गया कि क्या भारत सरकार मानवाधिकारों को लेकर अपनी कुछ खामियों को स्वीकार करती है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित अभियानों का शिकार होता रहा है।
"ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं, जिनमें सुधार की आवश्यकता होती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर देखें तो मानवाधिकारों के मामले में भारत का रिकॉर्ड मजबूत है।"
उन्होंने यह भी कहा कि मानवाधिकारों को लेकर भारत पर लगने वाले आरोप "अनुचित और निराधार" हैं।
चर्चा के दौरान जयशंकर ने भारत सरकार की नीति का बचाव करते हुए कहा कि सरकार सभी नागरिकों को समान लाभ देने के सिद्धांत पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कुछ हिस्सों में पहचान की राजनीति को "बनाने और उसे बढ़ावा देने" की प्रवृत्ति देखी जाती है।
"अच्छी राजनीति का अर्थ है—अपने सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना," उन्होंने कहा।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत के भीतर और बाहर कुछ समूह और विदेशी सरकारें इस विषय पर अलग-अलग चिंताएं व्यक्त करती रही हैं, जो सिर्फ लाभ वितरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से भी जुड़ी हुई हैं।





