नेताओं को अपने शब्द बदलने पड़े
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही सरकारी संचार साधनों का इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार के दौरान करते हैं। लेकिन दूरदर्शन और आकाशवाणी ने विपक्ष के भाषणों में से कई शब्दों पर आपत्ति जतायी है। सीताराम येचुरी को दूरदर्शन टेलीविज़न पर अपने संबोधन के दौरान दो शब्दों को बदलना पड़ा। यह दो शब्द हैं ‘बैंकरप्सी’ यानी दिवालियापन जिसे ‘फेल्योर’ शब्द से बदलना पड़ा, दुसरा ‘चुनावी बॉन्ड’ के संदर्भ को अपने संबोधन में से हटाना पड़ा। ऐसा ही जी देवराजन के साथ हुआ, जिन्हे कोलकाता में अपने संबोधन में से ‘मुस्लिम’ शब्द के बदले ‘विशेष समुदाय’ शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा।
सीताराम येचुरी ने दूरदर्शन के महानिदेशक को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति जतायी। उन्होंने कहा, “दूरदर्शन पर मेरे संबोधन के टेक्स्ट पर लगायी गयी सेंसरशिप लोकतंत्र में असहमति के अधिकार को साफ़ तौर पर खारिज करती है। ‘कम्युनल अथॉरिटेरियन रिजीम’ और ‘कठोर कानून’ जैसे शब्दों को हटाने का निर्देश दिया गया है।संसदीय लोकतंत्र में प्रत्येक राजनीतिक पार्टी को सरकार के रवैये और उसकी नीयत पर अपनी राय रखने का अधिकार है। मेरे शब्दों को हटाना, सरकार के चरित्र को दिखाता है।”
इस मामले पर देवराजन ने कहा, “मेरे संबोधन में विवादित नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए को लेकर एक लाइन थी। जिसमें मुस्लिम शब्द शामिल था, अधिकारी ने मुझे उस शब्द को हटाने के लिए कहा। जिसकी जगह ‘विशेष समुदाय’ शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा। मैंने अपने संबोधन में सीएए और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर आलोचना की थी।”
प्रसार भारती ने क्या कहा
नेताओं के विरोध पर प्रसार भारती के एक अधिकारी ने कहा कि दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडिओ दोनों ही चुनाव आयोग के नियमों का पालन कर रहे हैं। जिसके चलते अधिकतर नेताओं के साथ ऐसा हुआ है, जिनमें मुख्यमंत्रियों के भी भाषण शामिल हैं। आयोग के निर्देशों में अन्य देशों की आलोचना, धर्म /समुदायों पर हमला, हिंसा भड़काने या अदालत की अवमानना, राष्ट्रपति और न्यायपालिका की अंखडता पर हमला, व्यक्तिगत आलोचना और राष्ट्र अंखडता को तोड़ने वाली चीज़ों से बचने के लिए कहा गया है।





