साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने अपने आदेश में कहा, “अभियुक्त मेधा पाटकर लगातार अदालत की अवमानना कर रही हैं और उन्होंने स्पष्ट रूप से सजा आदेश को लागू नहीं किया है। चूंकि उनके खिलाफ कोई स्थगन आदेश नहीं है, इसलिए अब कानून प्रवर्तन एजेंसियों के माध्यम से उन्हें पेश कराना जरूरी हो गया है।”
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त के माध्यम से गैर-जमानती वारंट जारी करते हुए अगली सुनवाई 3 मई निर्धारित की है। साथ ही यह भी चेतावनी दी कि यदि पाटकर अगली सुनवाई में भी अनुपस्थित रहती हैं, तो पहले दी गई “उदार सजा” पर पुनर्विचार किया जाएगा।
यह मामला वर्ष 2001 का है, जब विनय सक्सेना, जो अब दिल्ली के उपराज्यपाल हैं, अहमदाबाद स्थित एनजीओ 'नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज' के प्रमुख थे। उन्होंने मेधा पाटकर पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 25 नवंबर 2000 को जारी प्रेस बयान में उन्हें "कायर", "देशविरोधी" और "हवाला लेनदेन में लिप्त" बताया था।
इस पर कोर्ट ने मेधा पाटकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत दोषी ठहराया था।
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उन्हें पांच महीने की कैद और 10 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने अपील दायर की थी। हालांकि, अपील के दौरान उन्हें अंतरिम जमानत मिल गई थी और सजा पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी। मेधा पाटकर की ओर से अधिवक्ता अभिमन्यु श्रेष्ठ ने पक्ष रखा, जबकि उपराज्यपाल विनय सक्सेना की ओर से अधिवक्तागण गजिंदर कुमार, किरण जय, चंद्रशेखर और सौम्या आर्या ने पैरवी की।





