कमेटी द्वारा दी गई सिफारिशों के अनुसार, अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी को दूर करने के लिए निजी क्षेत्र के डॉक्टरों को ओपीडी और ऑपरेशन के लिए घंटों के हिसाब से भुगतान कर बुलाने का सुझाव दिया गया था। इसके अलावा, दो महीने का दवाइयों का स्टॉक रखा जाने और वार्षिक जरूरत की 50 प्रतिशत दवाइयों तथा उपकरणों का बजट पहले से तैयार रखने की सिफारिश की गई थी।
हाईकोर्ट ने एम्स निदेशक से कहा कि वह दिल्ली सरकार के संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक करें और सुनिश्चित करें कि सिफारिशों को लागू करने की तारीख तय की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब केवल सुनवाई नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों में सुधार की वास्तविक तस्वीर सामने आनी चाहिए। जन औषधि केंद्र खोलने के प्रस्ताव को भी भेजा गया है ताकि अस्पतालों में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
सरकार ने भी कई कदम उठाने की जानकारी दी, जैसे कि अस्पतालों में खराब उपकरणों की मरम्मत में देरी करने वालों पर आर्थिक दंड लगाया जा रहा है, नर्सिंग और अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की कमी को संविदा के आधार पर दूर किया जा रहा है, और एमबीबीएस करने वाले छात्रों को तीन साल तक सरकारी अस्पताल में सेवा देने की अनिवार्यता को लागू किया जा रहा है।
इसके अलावा, खून की जांच अस्पतालों और मोहल्ला क्लीनिकों में की जा रही है, और गंभीर मरीजों की जांच प्राइवेट लैब से कराई जा रही है। हर जिले में पांच एंबुलेंस उपलब्ध कराने का भी प्रस्ताव दिया गया है।
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