हलाल सर्टिफिकेशन का दायरा और आर्थिक प्रभाव
सॉलिसिटर जनरल ने बताया, “मैं यह देखकर हैरान हूं कि मांस से इतर उत्पाद भी हलाल सर्टिफाई किए जा रहे हैं। यहां तक कि सीमेंट, सरिया और पानी की बोतलें भी इस्लामी कानूनों के अनुरूप प्रमाणित की जा रही हैं। यह सर्टिफिकेशन एजेंसियों के लिए लाखों करोड़ रुपये कमाने का जरिया बन गया है।”
उन्होंने इस सर्टिफिकेशन के कारण वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर भी चिंता जताई। उन्होंने सवाल किया कि जो लोग हलाल का पालन नहीं करते, उन्हें महंगे उत्पाद खरीदने के लिए क्यों मजबूर किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष: चॉइस का मामला
याचिका दायर करने वाले हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और जमीयत उलमा महाराष्ट्र की ओर से पेश सीनियर वकील एम.आर. शमशाद ने तर्क दिया कि हलाल सर्टिफिकेशन एक निजी पसंद (मैटर ऑफ चॉइस) का मामला है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों में हलाल को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है और यह सिर्फ मांसाहारी उत्पादों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने आदेश में राज्य के भीतर हलाल सर्टिफिकेशन वाले फूड प्रोडक्ट्स के निर्माण, भंडारण, बिक्री, और वितरण पर प्रतिबंध लगाया था। इस आदेश को याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना है कि यह प्रतिबंध असंवैधानिक है और व्यापार की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यूपी सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत अब यह विचार करेगी कि हलाल सर्टिफिकेशन के व्यापक दायरे और इसके आर्थिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार का प्रतिबंध वैध है या नहीं। इस मामले में अदालत को यह तय करना होगा कि हलाल सर्टिफिकेशन के कारण गैर-हलाल उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार और व्यवसाय करने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन है या नहीं।





