फरक्का जल संधि पर तकरार
बिहार में बांग्लादेश के साथ हुई फरक्का जल संधि को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। जदयू और राजद के नेता आमने-सामने आ गए हैं। जदयू इस संधि के नवीनीकरण के खिलाफ है, जिसके समर्थन में पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी लगातार बयान दे रहे हैं। उनका कहना है कि यह जल संधि बिहार और देश के लिए हानिकारक है।
जदयू ने यह आरोप भी लगाया है कि लालू प्रसाद यादव ने सत्ता में रहते हुए इस संधि पर कोई विरोध नहीं किया। इस मुद्दे पर तकरार की शुरुआत राजद द्वारा किए गए पलटवार से हुई है।
लालू प्रसाद का बयान
लालू प्रसाद यादव ने शनिवार को एक बयान जारी करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने संसद में इस विषय पर कभी कुछ नहीं कहा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने हर मंच पर फरक्का बांध का कड़ा विरोध किया है, क्योंकि उन्होंने इस संधि के कारण बिहार को होने वाले नुकसान को गंभीरता से पहचाना था।
लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार के समर्थकों को सलाह दी कि वे जल संसाधन विभाग की जानकारी, गंगा नदी में जल की उपलब्धता और बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय संधि के प्रभावों पर अध्ययन करें।
राजद का पलटवार
जदयू के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए राजद के वरिष्ठ नेता आलोक मेहता ने कहा कि फरक्का का मुद्दा नया नहीं है और उनके दल ने शुरू से ही इसका विरोध किया है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य में जदयू की सरकार होने के बावजूद, उन्होंने इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
उन्होंने कहा, "1995 से बिहार सरकार गंगा के पानी के बंटवारे की मांग कर रही है, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई है।"
फरक्का संधि के महत्वपूर्ण तथ्य
फरक्का जल संधि, जो 12 दिसंबर 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच हुई थी, का बिहार की जल प्रबंधन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इस संधि के अनुसार, बांग्लादेश को अतिरिक्त जल प्रदान किया जाता है, जिसके कारण बिहार में जल संकट उत्पन्न होता है।
इसके अलावा, बिहार में गंगा नदी के किनारे बसे क्षेत्रों को बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जोकि फरक्का बैराज में जमी गाद के कारण होता है।
संधि के नवीनीकरण की आवश्यकता
राजद के नेता आलोक मेहता ने कहा कि यदि एनडीए सरकार ठोस कदम उठाती, तो बिहार की बाढ़ की समस्याओं का समाधान निकल सकता था। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी फरक्का संधि का विरोध करती रहेगी।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावग ने कहा कि फरक्का का मुद्दा केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, इसलिए संधि के नवीनीकरण के समय राज्य की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
राजनीतिक इतिहास का संदर्भ
यह ध्यान देने वाली बात है कि 1996 में हुई फरक्का संधि के समय, लालू यादव केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में एक महत्वपूर्ण नेता थे और बिहार के मुख्यमंत्री भी थे। इसके बावजूद, उन्होंने इस संधि के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई।
जदयू के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने इस विषय पर कहा कि लालू प्रसाद यादव को अब इस मुद्दे पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।





