मोदी का संदेश और 1971 की ऐतिहासिक भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पत्र में लिखा,
"यह दिन हमारे साझा इतिहास और बलिदान का प्रमाण है, जिसने हमारी द्विपक्षीय साझेदारी की नींव रखी है। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम की भावना हमारे संबंधों को मार्गदर्शन देती रही है, जिससे कई क्षेत्रों में हमारे रिश्ते मजबूत हुए हैं और हमारे लोगों को ठोस लाभ पहुंचे हैं। हम शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए अपनी साझा आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"
गौरतलब है कि 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के लोगों को सैन्य, राजनयिक और मानवीय सहायता प्रदान की थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ युद्ध लड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।
बांग्लादेश में बदलता राजनीतिक परिदृश्य और भारत से रिश्ते
प्रधानमंत्री मोदी ने यह पत्र ऐसे समय में लिखा है जब बांग्लादेश की नई सरकार राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रही है। पिछले साल 5 अगस्त को हुए राजनीतिक बदलाव के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया था। इसके बाद से बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान से जुड़े प्रतीकों और विरासत को मिटाने की कोशिशें की जा रही हैं।
शेख हसीना की विदाई के बाद बांग्लादेश की नई सरकार का भारत के प्रति रुख अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा है। बॉर्डर सुरक्षा, बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर ढाका का रवैया बदला हुआ नजर आ रहा है। यही कारण है कि भारत भी बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को लेकर सतर्कता बरत रहा है।
यूनुस की पीएम मोदी से मुलाकात की संभावना
बांग्लादेश की नई सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने प्रधानमंत्री मोदी से मिलने की इच्छा जताई है और इसके लिए भारत को आधिकारिक संदेश भी भेजा है। माना जा रहा है कि बैंकॉक में 3-4 अप्रैल को होने वाले बिमस्टेक शिखर सम्मेलन के दौरान यूनुस और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात हो सकती है। हालांकि, इस पर अभी तक भारत की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पहले एक संसदीय समिति को बताया था कि बांग्लादेश के अनुरोध पर विचार किया जा रहा है, लेकिन मोदी की द्विपक्षीय बैठकों की घोषणा बाद में की जाएगी।
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