केंद्र सरकार द्वारा पारित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सरकार का दावा है कि यह कानून नागरिकों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और निजता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। हालाँकि, देश के प्रमुख मीडिया संगठनों और संपादकों का मानना है कि इसके कई कड़े प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता, खोजी पत्रकारिता और सूचना के अधिकार (RTI) को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
DNPA पहुँची कोर्ट: सहमति की शर्त और खोजी पत्रकारिता में अड़चन
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), जिसमें देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज़ मीडिया संगठन शामिल हैं, ने इस कानून के प्रावधानों के खिलाफ अदालत का रुख किया है। एसोसिएशन का तर्क है कि भ्रष्टाचार या गड़बड़ियों का पर्दाफाश करने के लिए व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से पहले संबंधित व्यक्ति से सहमति लेने की शर्त खोजी पत्रकारिता को बेहद मुश्किल बना देगी। इसके अतिरिक्त, प्रकाशित खबरों को हटाने की माँग और गोपनीय सूत्रों (Sources) की पहचान उजागर होने का जोखिम भी मीडिया संगठनों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
RTI एक्ट में बदलाव और जनहित की अनदेखी
इस कानून के जरिए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 में भी संशोधन किया गया है। नए प्रावधानों के तहत किसी भी व्यक्ति से जुड़ी निजी जानकारी को सार्वजनिक करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है, भले ही उसमें बड़ा सार्वजनिक हित (Public Interest) क्यों न शामिल हो। पहले कानून में यह गुंजाइश थी कि जनहित से जुड़ी सूचनाएँ दी जा सकती थीं। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अजीत प्रकाश शाह ने भी तत्कालीन अटर्नी जनरल को पत्र लिखकर इस संशोधन को वापस लेने की माँग की थी।
वैश्विक मानदंड और भारतीय परिदृश्य
यूरोप और सिंगापुर जैसे कई अन्य देशों के डेटा प्रोटेक्शन कानूनों में पत्रकारिता और जनहित में की जाने वाली रिपोर्टिंग को विशेष छूट (Exemption) दी गई है। भारतीय मीडिया संगठनों का कहना है कि भारत में भी इस तरह की वैधानिक सुरक्षा दी जानी चाहिए, ताकि निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे।
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