एक प्रेस वार्ता के दौरान, रफीकुल आलम ने कहा, "सोमवार को हमने राजनयिक नोट भेजा था। अभी तक भारत सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। हम इस पर फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और भारत के जवाब का इंतजार करेंगे। हमारी अगली कार्रवाई उसी उत्तर पर आधारित होगी।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण संधि में कोई विशेष समयसीमा नहीं है, लेकिन किसी भी मामले का उत्तर देने का एक स्वाभाविक समय होता है। यदि बांग्लादेश को निश्चित समय के भीतर जवाब नहीं मिलता है, तो वह तात्कालिकता पत्र (नोट ऑफ अर्जेन्सी) भेजेगा, जिससे भारत को यह स्पष्ट किया जाएगा कि बांग्लादेश इस मुद्दे पर जवाब की उम्मीद कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि दो दिन पहले ही यह नोट भेजा जा चुका है, लेकिन अगले कदम के बारे में फिलहाल कोई जानकारी नहीं दी जा सकती।
इस बीच, बांग्लादेश सरकार के एक उच्च अधिकारी ने भारत में महफूज आलम की उस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी, जो उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट की थी और जिसमें उन्होंने कुछ भारतीय क्षेत्रों को बांग्लादेश का हिस्सा होने की बात की थी। महफूज आलम ने अपने पोस्ट में यह भी कहा था कि भारत को उस विद्रोह को मान्यता देनी चाहिए जिसने शेख हसीना को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया। बाद में इस पोस्ट को हटा लिया गया, और बांग्लादेश सरकार ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार के उप प्रेस सचिव अपूर्वा जहांगीर ने कहा कि महफूज आलम द्वारा किया गया यह पोस्ट केवल उनकी व्यक्तिगत राय थी, और उन्होंने बाद में एक स्पष्टीकरण पोस्ट किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि उनकी टिप्पणियां सरकार की आधिकारिक स्थिति को नहीं दर्शाती हैं। अपूर्वा जहांगीर ने कहा कि इस तरह की निजी राय सरकार की नीतियों का हिस्सा नहीं होती है और इसे सरकार के दृष्टिकोण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
बांग्लादेश की सरकार की ओर से इस तरह की स्पष्टता को देखते हुए यह संकेत मिलता है कि बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में सतर्कता बनाए रखना चाहता है, खासकर जब बात भारत जैसे महत्वपूर्ण पड़ोसी देश से जुड़ी हो। दोनों देशों के बीच राजनीतिक और राजनयिक संबंधों में इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दे आसानी से तनाव का कारण बन सकते हैं, और बांग्लादेश ने अपनी ओर से यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी मामले को सही और संयमित तरीके से संभाला जाए।





