पटना हाईकोर्ट ने सेंट्रल जीएसटी और कस्टम्स अधिकारियों को एक टैक्सपेयर को 1.24 लाख रुपये रिफंड करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया है कि ब्याज और 25,000 रुपये की मुकदमेबाजी का खर्च लापरवाह अधिकारियों के वेतन से वसूला जाए।
पूरा मामला क्या है?
पटना के रहने वाले शशि कांत सिंह ने सितंबर 2022 में सेवा कर (Service Tax) की मांग के खिलाफ अपील की थी, जिसके लिए उन्हें प्री-डिपॉजिट जमा करना था। उन्होंने 16 जून 2023 को ICEGATE पोर्टल के जरिए SBI नेट बैंकिंग से 1,24,175 रुपये का भुगतान किया। हालांकि, पैसे कटने के बावजूद पोर्टल पर 'क्लाइंट मौजूद नहीं' होने का एरर आ गया। डेडलाइन पास होने के कारण उन्हें आरटीजीएस (RTGS) के जरिए दोबारा वही रकम जमा करनी पड़ी। पहली बार कटा हुआ पैसा वापस न मिलने पर उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि मामला बहुत सीधा था और शिकायत मिलने पर विभाग को तुरंत रिफंड कर देना चाहिए था। कोर्ट ने माना कि विभाग की लापरवाही के कारण टैक्सपेयर को बेवजह अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अदालत का निर्देश
हाईकोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर दूसरी बार भुगतान की गई 1.24 लाख रुपये की राशि, उस पर 12% वार्षिक ब्याज और 25,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में वापस करने का आदेश दिया है। साथ ही, अदालत ने विभाग को यह छूट भी दी है कि वे देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करें और यह पूरा हर्जाना व ब्याज उन्हीं से वसूलें। यह फैसला प्रशासनिक लापरवाही के शिकार आम नागरिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।





