Molitics Logo
होम अंतरराष्ट्रीय अमृतकाल में शिक्षा का सवाल: एशिया के टॉप 50 से भारत गायब, कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का संकट
अंतरराष्ट्रीय • दिल्ली

अमृतकाल में शिक्षा का सवाल: एशिया के टॉप 50 से भारत गायब, कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का संकट

अमृतकाल में शिक्षा बेहाल, एशिया के टॉप 50 से भारत गायब

अमृतकाल में शिक्षा का सवाल: एशिया के टॉप 50 से भारत गायब, कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का संकट
फोटो: Indian Education System, Narendra Modi

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। सरकार इस दौर को अमृतकाल कहती है और नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा तथा आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों के जरिए शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की बात करती है। लेकिन विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग और देश के कई सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है।

QS Asia University Rankings 2027 में भारत के 325 संस्थानों को जगह मिली है। यह संख्या भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के बड़े आकार को दिखाती है, लेकिन शीर्ष स्थानों पर भारत की मौजूदगी अब भी कमजोर है। एशिया के टॉप 50 संस्थानों में एक भी भारतीय संस्थान शामिल नहीं है। टॉप 100 में भारत के सिर्फ छह संस्थान जगह बना पाए हैं।

एशिया के टॉप 100 में सिर्फ छह भारतीय संस्थान

QS की एशिया रैंकिंग में IIT दिल्ली 66वें स्थान के साथ भारत का सर्वोच्च रैंक वाला संस्थान है। इसके बाद IISc बेंगलुरु 79वें, IIT बॉम्बे 83वें, IIT मद्रास 85वें, IIT खड़गपुर 90वें और IIT कानपुर 97वें स्थान पर हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय 106वें, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 128वें और जामिया मिल्लिया इस्लामिया 183वें स्थान पर हैं। यानी भारत की बड़ी आबादी और विशाल उच्च शिक्षा व्यवस्था के बावजूद एशिया के शीर्ष 100 में भारतीय संस्थानों की संख्या बेहद सीमित है। इसमें एक और बात ध्यान देने वाली है। टॉप 100 में जगह बनाने वाले सभी भारतीय संस्थान IIT या IISc जैसे विज्ञान और तकनीक केंद्रित संस्थान हैं। देश का कोई पारंपरिक विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में नहीं पहुंच पाया।

71% भारतीय संस्थानों की रैंकिंग में गिरावट

2027 की रैंकिंग में भारत के लिए चिंता की दूसरी वजह कई संस्थानों की रैंक में गिरावट है। पिछले साल की तुलना में 71% भारतीय संस्थानों की रैंक नीचे गई है। IIT दिल्ली 59वें से 66वें स्थान पर पहुंच गया। IISc बेंगलुरु 64वें से गिरकर 79वें स्थान पर आ गया। IIT बॉम्बे 71वें से 83वें और IIT मद्रास 70वें से 85वें स्थान पर पहुंच गया। दिल्ली विश्वविद्यालय भी 95वें से गिरकर 106वें स्थान पर आ गया।

हालांकि विश्वविद्यालय रैंकिंग को किसी देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। रैंकिंग की अपनी पद्धति और मानक होते हैं। इसके बावजूद शीर्ष संस्थानों की स्थिति शोध, अंतरराष्ट्रीय पहचान, शिक्षकों और संसाधनों जैसे क्षेत्रों में भारत के सामने मौजूद चुनौतियों की ओर इशारा करती है।

दुनिया की रैंकिंग में भी लंबा सफर बाकी

QS World University Rankings 2027 में भारत के 52 संस्थानों को शामिल किया गया है। इनमें IIT दिल्ली 118वें स्थान के साथ भारत का शीर्ष संस्थान है। IIT बॉम्बे 134वें और IIT मद्रास 170वें स्थान पर हैं। IIT खड़गपुर 205वें स्थान पर है, जबकि IIT कानपुर और IISc बेंगलुरु 221वें स्थान पर हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय को 322वां और JNU को 527वां स्थान मिला है। भारत लंबे समय से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और खुद को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों की वैश्विक स्थिति सिर्फ प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। इसका संबंध शोध, नई तकनीक, वैज्ञानिक क्षमता और भविष्य की अर्थव्यवस्था से भी है।

दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों की जमीनी तस्वीर

उच्च शिक्षा की रैंकिंग से अलग, देश की स्कूल शिक्षा भी कई बुनियादी चुनौतियों से जूझ रही है।

हरियाणा के नूंह जिले में कम से कम 19 सरकारी स्कूलों के बिना अपनी इमारत के चलने की खबर सामने आई है। कुबड़ा बास गांव में बच्चों के मवेशियों के बाड़े में बैठकर पढ़ने की बात सामने आई, जबकि कालूबास गांव में पेड़ों पर ब्लैकबोर्ड बांधकर खुले मैदान में कक्षाएं लगाई जा रही हैं। कई जगह शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। एक शिक्षक को कई कक्षाओं के बच्चों को संभालना पड़ता है। राजस्थान से भी जर्जर स्कूल भवनों के कारण बच्चों की कक्षाएं गौशालाओं में लगने की खबरें सामने आई हैं। यह सिर्फ इमारतों का सवाल नहीं है। जब स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन, साफ पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी, तो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना मुश्किल हो जाता है।

विकसित भारत की राह में शिक्षा सबसे बड़ा सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' बताते रहे हैं। सरकार ने 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य रखा है। अमृतकाल का विचार भी इसी लक्ष्य से जुड़ा है। लेकिन विकसित देश बनने की बुनियाद सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था या आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं बनती। इसके लिए मजबूत स्कूल, बेहतर विश्वविद्यालय, पर्याप्त शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शोध की जरूरत होती है। एक तरफ भारत के शीर्ष संस्थान एशिया के टॉप 50 में जगह नहीं बना पा रहे हैं और दूसरी तरफ देश के कई सरकारी स्कूल आज भी इमारत और शिक्षकों जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सरकार की नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा और आधुनिक स्कूलों की योजनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन असली चुनौती इन योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनेगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि उस विकसित भारत को तैयार करने वाले बच्चों को आज कैसी शिक्षा मिल रही है। बिना मजबूत स्कूलों, पर्याप्त शिक्षकों और विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों के विकसित भारत का सपना अधूरा रह सकता है।