बैंक भर्ती में 180 फ़र्ज़ी उम्मीदवारों का खुलासा, UP दरोगा भर्ती में भी सामने आया सॉल्वर गैंग का खेल
बैंक की सरकारी नौकरी को आम तौर पर सुरक्षित और पारदर्शी माना जाता है। लेकिन CBI की जाँच में बैंक भर्ती परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली का खुलासा हुआ है। जाँच एजेंसी ने दिल्ली, हरियाणा और कोलकाता से चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें केंद्र सरकार के CGST विभाग का एक इंस्पेक्टर भी शामिल है।
यह मामला इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनेल सिलेक्शन (IBPS) की शिकायत पर दर्ज किया गया। IBPS सरकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में भर्ती परीक्षाएं आयोजित करता है। CBI ने 20 अगस्त को FIR दर्ज की, जिसमें 135 चयनित उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं।
IBPS ने 2020 से 2024 के बीच हुई परीक्षाओं के डेटा, तस्वीरों और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इसमें 257 चयनित उम्मीदवार संदिग्ध पाए गए, जिनमें से 180 आज भी सरकारी और ग्रामीण बैंकों में नौकरी कर रहे हैं। IBPS के मुताबिक, 54 लोगों ने दो या उससे ज़्यादा उम्मीदवारों की जगह परीक्षा दी और 172 लोगों को नौकरी दिलाने में मदद की। CBI 62 अन्य लोगों की भूमिका की भी जाँच कर रही है।
कैसे काम करता है सॉल्वर गैंग?
CBI के मुताबिक, यह नेटवर्क महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में सक्रिय था। जाँच और पूछताछ में सामने आई जानकारी के अनुसार, सॉल्वर गैंग एक संगठित सिंडिकेट की तरह काम करते हैं।
सबसे पहले ऐसे उम्मीदवारों की तलाश की जाती है, जो सरकारी नौकरी तो पाना चाहते हैं, लेकिन परीक्षा पास नहीं कर पा रहे। एजेंट कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी और ऑनलाइन ग्रुप्स के ज़रिए उनसे संपर्क करते हैं। एक परीक्षा के लिए 4 से 10 लाख और अधिकारी स्तर की भर्ती के लिए 15 से 25 लाख रुपये तक का सौदा होने की बात सामने आई है।
इसके बाद गैंग किसी होनहार छात्र या योग्य व्यक्ति को 'सॉल्वर' के तौर पर तैयार करता है। कुछ मामलों में सरकारी कर्मचारी भी दूसरे उम्मीदवारों की जगह परीक्षा देते पाए गए हैं। बैंक भर्ती मामले में CGST इंस्पेक्टर और UP दरोगा भर्ती से जुड़े एक मामले में प्रयागराज के रेलवे कार्यालय के ग्रुप-सी (Group C) कर्मचारी का नाम सामने आया था।
फ़र्ज़ीवाड़े के लिए अपनाए जाते हैं अलग-अलग तरीके
सॉल्वर गैंग आवेदन के समय ही असली उम्मीदवार और सॉल्वर की तस्वीरों में बदलाव (फ़ोटो मर्जिंग) करके एक मिलती-जुलती तस्वीर तैयार करते हैं। इसका इस्तेमाल एडमिट कार्ड में किया जाता है, ताकि परीक्षा केंद्र पर पहचान में आसानी से गड़बड़ी की जा सके।
बायोमेट्रिक जाँच को चकमा देने के लिए फ़िंगरप्रिंट की नकली कॉपी तैयार करने या मशीन में तकनीकी खराबी दिखाने जैसे तरीके अपनाने के आरोप भी सामने आए हैं।
ऑनलाइन परीक्षाओं में परीक्षा केंद्र के कंप्यूटर पर रिमोट एक्सेस सॉफ़्टवेयर या अलग नेटवर्क के इस्तेमाल के मामले सामने आए हैं। इससे बाहर बैठा सॉल्वर कंप्यूटर को नियंत्रित कर लेता है, जबकि असली उम्मीदवार स्क्रीन के सामने बैठा रहता है।
कुछ मामलों में सॉल्वर लिखित परीक्षा के साथ-साथ इंटरव्यू और भर्ती के अन्य चरणों में भी शामिल होते हैं। उम्मीदवार का अंतिम चयन होने और जॉइनिंग लेटर मिलने के बाद ही गैंग को बाकी रकम का भुगतान किया जाता है।
UP में भी लगातार सामने आ रहे हैं ऐसे मामले
उत्तर प्रदेश में हाल के दिनों में कई परीक्षाओं में धांधली के मामले सामने आए हैं:
* 4 नवंबर: UP Special TET में लखनऊ के एक केंद्र पर दूसरे अभ्यर्थी की जगह परीक्षा देता सॉल्वर पकड़ा गया।
* 30 अक्टूबर से 1 नवंबर: UPSSSC PET में झाँसी में एक उम्मीदवार के पास ब्लूटूथ डिवाइस मिलने की रिपोर्ट आई। परीक्षा पास कराने के लिए ढाई लाख रुपये के सौदे की बात भी सामने आई।
* ग्रेटर नोएडा: UP STF ने SSC परीक्षाओं को निशाना बनाने वाले रिमोट सिंडिकेट का पर्दाफ़ाश किया। सात लोग गिरफ्तार हुए, 50 लाख रुपये नकद बरामद हुए और परीक्षा एजेंसी Assess Infra के दो निदेशकों को भी गिरफ्तार किया गया।
* कानपुर: IBPS PO की ऑनलाइन परीक्षा में चार लोग गिरफ्तार हुए। आरोप है कि दिव्यांग कोटे के फ़र्ज़ी प्रमाण-पत्र बनवाकर सॉल्वर को अधिकृत सहायक (Scribe) के रूप में उम्मीदवार के बगल में बैठाया जाता था।
इससे पहले फ़रवरी 2024 में UP पुलिस कांस्टेबल भर्ती का पेपर लीक हुआ था। तत्कालीन DGP प्रशांत कुमार के मुताबिक, पेपर प्रिंटिंग प्रेस से स्ट्रॉन्ग रूम ले जाते समय लीक हुआ था। उस समय तक 54 गिरफ्तारियाँ और 12 FIR दर्ज हो चुकी थीं।
UP दरोगा भर्ती 2020-21 में भी बड़ा फ़र्ज़ीवाड़ा
उत्तर प्रदेश में सॉल्वर गैंग का सबसे चर्चित मामला दरोगा भर्ती 2020-21 से जुड़ा है। UP Police Recruitment and Promotion Board ने 9,534 पदों के लिए 12 नवंबर से 2 दिसंबर 2021 के बीच 54 पारियों (Shifts) में कंप्यूटर आधारित परीक्षा कराई थी। इसकी ज़िम्मेदारी NSEIT एजेंसी के पास थी।
इस भर्ती में 10 से 15 लाख रुपये लेकर उम्मीदवारों को पास कराने के आरोप लगे। जाँच में कुछ परीक्षा केंद्रों पर रिमोट एक्सेस टूल और अलग नेटवर्क के इस्तेमाल की बात सामने आई।
अलीगढ़ में STF ने ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली में सेंध लगाने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार किया और कंप्यूटर, CPU, राउटर व हार्ड डिस्क बरामद कीं। वाराणसी में भी तीन आरोपी 12 एडमिट कार्ड के साथ पकड़े गए। कुछ केंद्रों पर परीक्षा के आखिरी 10-15 मिनट में जवाब भेजकर सवाल हल कराने के आरोप लगे। कुछ उम्मीदवारों के 160 में से 156 से 158 जवाब सही पाए गए।
CRL रिपोर्ट से खुला फ़र्ज़ीवाड़ा
भर्ती बोर्ड ने कैंडिडेट रिस्पॉन्स लॉग (Candidate Response Log - CRL) की जाँच की। इसमें कंप्यूटर पर उम्मीदवार की गतिविधियों और हर सवाल पर लगाए गए समय का पूरा रिकॉर्ड होता है।
जाँच में पाया गया कि कुछ उम्मीदवारों ने गणित और सामान्य ज्ञान के अत्यंत कठिन सवाल महज़ 5 से 15 सेकंड में हल कर दिए थे। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से नकल का शक गहराया। STF ने 200 से ज़्यादा लोगों पर कार्रवाई की। दस्तावेज़ सत्यापन (DV) और शारीरिक परीक्षण (PST) के दौरान फ़िंगरप्रिंट मैच न होने पर भी कई गिरफ्तारियाँ हुईं।
भर्ती पूरी होने के बाद भी जाँच जारी रही। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद भर्ती बोर्ड ने एक जाँच कमेटी बनाई। नवंबर 2024 में कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर FIR दर्ज हुई। आरोप था कि कुछ उम्मीदवार सॉल्वर की मदद से दरोगा बन चुके हैं। रिपोर्ट्स में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या चार से सात बताई गई। इनमें एटा की मालती और अलीगढ़ के गौरव कुमार का नाम सामने आया।
फ़र्ज़ी उम्मीदवारों से योग्य अभ्यर्थियों को कितना नुकसान?
दरोगा भर्ती में कुल 9,534 पद थे। हर फ़र्ज़ी उम्मीदवार किसी न किसी योग्य अभ्यर्थी का हक़ मारता है। यदि बड़ी संख्या में उम्मीदवार गलत तरीके से ऊंचे अंक हासिल कर लें, तो कट-ऑफ़ भी अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसका सीधा नुकसान उन अभ्यर्थियों को होता है, जिन्होंने ईमानदारी से पढ़ाई और तैयारी की थी।
इसके अलावा कई शिफ्टों में होने वाली परीक्षाओं में नॉर्मलाइज़ेशन प्रक्रिया के ज़रिए अंकों का समायोजन किया जाता है। अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि किसी शिफ्ट में बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी उम्मीदवार बेहद उच्च अंक प्राप्त कर लेते हैं, तो उस शिफ्ट के अन्य ईमानदार उम्मीदवारों की मेरिट सूची पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
दरोगा भर्ती पर हाई कोर्ट का फैसला
इस मामले में बोर्ड ने CRL में 5 से 15 सेकंड में सवाल हल करने को असामान्य मानकर उम्मीदवारों पर नकल में शामिल होने का शक जताया था।
उच्च न्यायालय की एकल पीठ (Single Bench) में जस्टिस नीरज तिवारी ने सरकार और बोर्ड की कार्रवाई को अनुचित ठहराया। कोर्ट ने कहा कि महज़ संदेह के आधार पर किसी उम्मीदवार को दोषी नहीं माना जा सकता। परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग भी नहीं थी, इसलिए कम समय में सही उत्तर देना बेहतर तैयारी या सटीक अनुमान (Guesswork) का नतीजा भी हो सकता है।
सरकार ने इस फैसले को खंडपीठ (Division Bench) में चुनौती दी, लेकिन जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की पीठ ने भी अपील ख़ारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ़ CRL में दर्ज समय के आधार पर नकल साबित नहीं होती; इसके लिए पुख्ता सबूतों की आवश्यकता है।
इसके बाद भर्ती बोर्ड ने संबंधित उम्मीदवारों की DV-PST प्रक्रिया शुरू करने का आधिकारिक नोटिस जारी किया।
भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
1. जब 2021-22 में ही दरोगा भर्ती में गड़बड़ी सामने आ गई थी, तो फ़र्ज़ी तरीके से नौकरी पाने वालों की शिनाख्त करने में 2024 तक का समय क्यों लगा?
2. यदि सरकार और प्रशासन के पास CRL जैसे डिजिटल रिकॉर्ड थे, तो अदालत में धांधली साबित करने के लिए अन्य ठोस सबूत क्यों नहीं जुटाए गए?
3. सरकार ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील ख़ारिज होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा क्यों नहीं खटखटाया?
इसके अलावा परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसियों और केंद्रों के कर्मचारियों की मिलीभगत भी गंभीर जाँच का विषय है। बैंक भर्ती में 180 संदिग्ध उम्मीदवारों का मामला यह साबित करता है कि यह समस्या किसी एक राज्य या परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बेहद व्यापक है।
सबसे बड़ा सवाल उन ईमानदार उम्मीदवारों का है, जिन्होंने बरसों मेहनत की, लेकिन इस संगठित फ़र्ज़ीवाड़े की वजह से अपना भविष्य गँवा दिया। आख़िरकार उनके इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?





