सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला
यह आदेश डॉक्टर एस. राजासेकरन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें देश के फुटपाथों की जर्जर स्थिति और दिव्यांगजनों को हो रही कठिनाइयों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया था। याचिकाकर्ता ने बताया कि देश के कई हिस्सों में या तो फुटपाथ हैं ही नहीं, और जहां हैं भी, वे या तो टूटे हुए हैं या अतिक्रमण का शिकार हैं। इससे दिव्यांगों की आवाजाही तो बाधित होती ही है, आम नागरिकों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए दलील दी गई कि सुरक्षित चलना भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अब तक इस विषय में कोई प्रभावी राष्ट्रीय नीति नहीं है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया:
- नई और पुरानी सड़कों पर तकनीकी मानकों के अनुरूप फुटपाथ अनिवार्य करना।
- फुटपाथों का ऐसा डिज़ाइन तैयार करना जो दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल हो।
- फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने और भविष्य में उसे रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर केंद्र सरकार तय समय में गाइडलाइन बनाने में विफल रहती है, तो वह अदालत के मित्र (अमिकस क्यूरी) की मदद से खुद दिशा-निर्देश तैयार करेगी। साथ ही राज्यों को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वे चाहें तो इन राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों को अपनाएं या फिर अपने स्तर पर समान मानकों वाली गाइडलाइंस बनाएं।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को भी निर्देश दिया गया है कि वह फुटपाथों की स्थिति और अपनी भूमिका पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 1 सितंबर 2025 तय की है। इस दौरान केंद्र और राज्यों की ओर से की गई कार्रवाई की समीक्षा की जाएगी और जवाबदेही तय की जाएगी। अदालत के इस फैसले से दिव्यांगजनों और आम पैदल यात्रियों के अधिकारों को सशक्त समर्थन मिला है।





