डाबर ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पतंजलि के ‘पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश’ के विज्ञापनों में जानबूझकर और झूठे आरोप लगाए गए हैं, जिनसे डाबर के च्यवनप्राश उत्पाद की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। डाबर का कहना है कि उसका च्यवनप्राश उत्पाद बाजार में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी के साथ अग्रणी है और ऐसे में इस तरह के अपमानजनक आरोपों का उनकी बिक्री पर सीधा असर पड़ा है।
इस मामले में अदालत ने डाबर की याचिका पर नोटिस भी जारी किया और आगामी सुनवाई के लिए 30 जनवरी की तारीख तय की है। डाबर ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि पतंजलि ने विज्ञापनों में दावा किया है कि केवल ‘पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश’ असली और विशिष्ट है, जो चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि, और च्यवन ऋषि द्वारा बताई गई विधि के अनुसार तैयार किया गया है। पतंजलि ने यह भी कहा है कि अन्य च्यवनप्राश उत्पादकों को इस विधि का कोई ज्ञान नहीं है, जिससे उनका उत्पाद साधारण और बिना गुणवत्ता के साबित होता है।
इसके अलावा, डाबर ने आरोप लगाया कि पतंजलि ने अपने विज्ञापनों में दावा किया कि उनकी आयुर्वेदिक पुस्तकों में दी गई विधि ही च्यवनप्राश बनाने का सही तरीका है, जबकि अन्य आयुर्वेदिक पुस्तकों और विधियों को नकारा गया है। डाबर ने इसे न केवल झूठा बल्कि उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला भी करार दिया।
डाबर ने कोर्ट से यह अनुरोध किया कि पतंजलि के उन विज्ञापनों पर स्थायी रूप से रोक लगाई जाए जो उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाते हैं और उनके उत्पाद 'डाबर च्यवनप्राश' के नाम का गलत तरीके से इस्तेमाल कर बदनाम करने का प्रयास करते हैं। इसके साथ ही, डाबर ने यह भी आग्रह किया है कि इन विज्ञापनों को टीवी या अन्य किसी भी माध्यम से प्रसारित करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि जनता को गलत जानकारी से बचाया जा सके।
इस मामले की सुनवाई अब 30 जनवरी को होगी, और इस पर कोर्ट का अगला फैसला मामले की दिशा तय करेगा।





