SIR प्रक्रिया से 4.5 करोड़ मतदाताओं पर असर
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने मसौदा सूची पर अस्थायी रोक लगाने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे करीब 4.5 करोड़ लोगों को असुविधा हो सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि सूची प्रकाशित होने के बाद यदि किसी व्यक्ति का नाम नहीं होता है, तो उसे आपत्ति दर्ज कराने और नाम जुड़वाने की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 10 जून को याचिका में मसौदा सूची पर रोक की मांग इसलिए नहीं की गई थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तब सुनवाई की अनुमति दी थी, जो मसौदा प्रकाशन की तिथि से पहले होनी थी।
SIR प्रक्रिया पर ECI की दलील: यह सिर्फ मसौदा सूची है
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि यह केवल एक मसौदा सूची है और अंतिम सूची में बदलाव संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि ECI अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट कर चुका है कि वह आधार, EPIC (मतदाता पहचान पत्र) और राशन कार्ड को सत्यापन के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं मानता, क्योंकि इनमें फर्जीवाड़े की संभावना होती है—विशेषकर राशन कार्डों में।
आधार और EPIC को करें शामिल
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने चुनाव आयोग के रुख पर सवाल उठाते हुए मौखिक रूप से कहा,
"आधिकारिक दस्तावेजों के साथ सत्यता की धारणा होती है। आप आधार और EPIC जैसे दस्तावेजों के साथ आगे बढ़ सकते हैं। जहाँ जालसाजी मिलेगी, उसे केस-टू-केस आधार पर निपटाया जा सकता है।"
उन्होंने चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि नागरिकों को सूची से बाहर रखने के बजाय "सामूहिक समावेशन" की नीति अपनाई जाए।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, "सामूहिक बहिष्कार की जगह सामूहिक समावेशन होना चाहिए।" इससे पहले न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति बागची की अवकाशकालीन पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा था कि नागरिकता का निर्धारण चुनाव आयोग का कार्य नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है। पीठ ने ECI से यह भी आग्रह किया था कि वह आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर विचार करे।





