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पहले प्यार, फिर इनकार और अब स्वीकार… कैसे पप्पू यादव को दे ही दी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी लिस्ट में एंट्री

पिछले कुछ वर्षों में बिहार की राजनीति में पप्पू यादव का नाम लगातार चर्चा में रहा है। पप्पू यादव ने शुरुआत में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी |

पहले प्यार, फिर इनकार और अब स्वीकार… कैसे पप्पू यादव को दे ही दी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी लिस्ट में एंट्री
फोटो: Pappu Yadav

पप्पू यादव का कांग्रेस-प्रेम और पहले की दूरी


पिछले कुछ वर्षों में बिहार की राजनीति में पप्पू यादव का नाम लगातार चर्चा में रहा है। पप्पू यादव ने शुरुआत में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी, उनकी अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी (JAP) बनी थी जिसको उन्होंने बाद में कांग्रेस के साथ विलय कराया था।

हालाँकि, कांग्रेस के अंदर उनके प्रति शुरुआत में सतर्कता दिखी थी। उदाहरण के तौर पर, लोकसभा 2024 के समय पूर्णिया सीट पर उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन भी किया था जबकि कांग्रेस ने उन्हें उस समय अपना प्रत्याशी नहीं बनाया था। इस प्रकार पप्पू यादव ने कांग्रेस का समर्थन लिया लेकिन कांग्रेस ने उन्हें तुरंत गले नहीं लगाया — प्रेम की शुरुआत ज़रूर थी, लेकिन दूरी बनी रही।

इनकार के दौर के बाद कब और कैसे हुआ स्वीकार


समय के साथ-साथ राजनीतिक समीकरण बदलते गए और उस बदलाव के हिस्से के रूप में कांग्रेस ने अपने लिए नए चेहरे तलाशने शुरू किए। इसी क्रम में, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के दौरान कांग्रेस ने अपनी 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की थी जिसमें पप्पू यादव का नाम भी शामिल था।

यह स्वीकार इस तरह हुआ कि पहले जहाँ कांग्रेस पप्पू यादव की सक्रिय भागीदारी को लेकर झिझक रही थी — नामांकन वापस लेने के अल्टीमेटम तक उन्हें देना पड़ा था। लेकिन अब उसी पप्पू यादव को सार्वजनिक तौर पर ‘स्टार प्रचारक’ बनाया गया, और कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिए कि वे अब पप्पू यादव को अपना माना है।

इस प्रकार “पहले प्यार, फिर इनकार, और अब स्वीकार” का चक्र पूरा हुआ यह दर्शाता है कि कितनी तेजी से राजनीति की धारा बदल सकती है — पप्पू यादव ने कांग्रेस के प्रति अपनी दृढ़ता दिखाई, और कांग्रेस ने अंततः उन्हें अपनी सूची में शामिल किया।

अब पप्पू यादव के शामिल होने का बिहार चुनावी माहौल और कांग्रेस के लिए महत्व


पप्पू यादव का कांग्रेस नेतृत्व में स्थान पाना कांग्रेस के बिहार रणनीति के लिहाज से बहुत मायने रखता है। पप्पू यादव की विशेष ताकत सीमांचल-कोसी क्षेत्र की है, जिसमें यादव, मुस्लिम, पिछड़ी जातियों का जनाधार है।

कांग्रेस ने स्पष्ट तौर पर इस बात का संकेत दिया है कि वह इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती है और पप्पू यादव की छवि तथा जन-समर्थन को अपने लिए लाभदायक मान रही है। इस तरह, पप्पू यादव का लिस्ट में शामिल होना कांग्रेस के लिए एक रणनीतिक कदम है।

इस मौके पर चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं —

  • पप्पू यादव पिछले कुछ समय में निर्दलीय राजनीति भी कर चुके हैं, इसलिए कांग्रेस के अंदर तथा गठबंधन-साझेदारों में संतुलन की जरूरत है।

  • कांग्रेस को यह भी सुनिश्चित करना है कि यह शामिल होना अन्य घटक दलों में गलत सन्देश न दे।

  • इसके साथ-साथ, पप्पू यादव को अपनी पहचान को कांग्रेस की मर्यादाओं एवं संगठनात्मक ढाँचे से जोड़ना होगा ताकि यह सिर्फ नाम तक का जुड़ाव न बन जाए।

वहीं, पप्पू यादव के लिए यह अवसर है कि वे अपनी राजनीतिक यात्रा को एक बड़े राष्ट्रीय-दल के साथ जोड़ सकें और वर्तमान समय में बिहार की राजनीति में सक्रिय रूप से कांग्रेस के नेतृत्व में भूमिका निभा सकें।

कुल मिलाकर, यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति-का शामिल होना नहीं बल्कि बिहार की राजनीति और कांग्रेस की नई रणनीति का प्रतीक माना जा सकता है। पप्पू यादव के नाम के साथ अब कांग्रेस ने एक बड़े चेहरे को अपनी सूची में शामिल कर लिया है, और अब देखना यह है कि इस शामिल होने से विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को कितने लाभ मिलते हैं और पप्पू यादव किस तरह अपने क्षेत्रीय व जन-जनाधार वाले दायित्व को निभाते हैं।