भाजपा ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार को इस प्रस्ताव को विधानसभा में पास करने के बाद ही केंद्र सरकार को भेजना चाहिए था, ताकि उस पर विचार किया जा सके और आवश्यक कदम उठाए जा सकें। भाजपा के मुताबिक, इस तरह के संवेदनशील मुद्दे को सीधे तौर पर और बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के उठाना सही नहीं है।
अब, इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने आम आदमी पार्टी के दावों का खंडन किया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि पिछले दस वर्षों में दिल्ली सरकार से कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं भेजा गया, जिसमें मांग की गई हो कि दिल्ली के जाट समुदाय को केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल किया जाए। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर ने एक इंटरव्यू में बताया कि "हमें दिल्ली सरकार से इस प्रकार का कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है। अगर ऐसा कोई प्रस्ताव आता, तो हम उसे गंभीरता से विचार करते और उस पर जरूरी कार्रवाई करते।"
यह बयान इस प्रकार से एक नई दिशा में मोड़ लेता है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव बस कुछ ही हफ्तों में होने वाले हैं। अरविंद केजरीवाल ने यह मुद्दा चुनाव से पहले उठाया था, और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम शायद जाट समुदाय के वोट बैंक को साधने के लिए उठाया गया था। दिल्ली के कई हिस्सों जैसे किशनगढ़, मुनिरका, और नरेला में जाट समुदाय की एक बड़ी आबादी निवास करती है, और इन इलाकों में जाट वोटरों का महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। ऐसे में यह समझा जा रहा है कि केजरीवाल ने जाटों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने की मांग को चुनावी रणनीति के रूप में उठाया है, ताकि वह इस समुदाय को अपनी तरफ आकर्षित कर सकें और चुनाव में लाभ उठा सकें।
हंसराज अहीर ने **इकनॉमिक टाइम्स** से बातचीत करते हुए इस मुद्दे पर विस्तार से बताया कि केंद्रीय ओबीसी सूची में किसी भी राज्य के समुदाय को शामिल करने का प्रस्ताव उस राज्य से ही आता है। उन्होंने कहा, "किसी भी राज्य के समुदाय को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए सबसे पहले उस राज्य की सरकार को एक प्रस्ताव भेजना होता है।
इसके बाद राज्य सरकार अपने समुदाय के पिछड़ेपन को लेकर एक स्टडी कराती है और फिर विधानसभा में उस प्रस्ताव को पास किया जाता है। जब विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तब वह केंद्र सरकार को भेजा जाता है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग इस प्रस्ताव पर विचार करता है और फिर अपनी सिफारिशें देता है।"
उन्होंने यह भी बताया कि यूपीए (संघीय यूंनी गठबंधन) के कार्यकाल में दिल्ली से दो बार जाटों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन दोनों बार यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। पहला प्रस्ताव 2010 में भेजा गया था, और दूसरा 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले भेजा गया था। हालांकि, दोनों बार केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी देने से इंकार कर दिया था। इसके अलावा, आयोग के सदस्य एके मंगोत्रा ने 26 फरवरी, 2014 को एक पत्र भेजा था जिसमें उन्होंने दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात सरकारों को यह सलाह दी थी कि जाटों को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया जाए।
मंगोत्रा के अनुसार, इन राज्यों में जाट समुदाय को पिछड़ा वर्ग के तौर पर मान्यता देने से संबंधित कोई ठोस और तर्कसंगत कारण नहीं था।
इस बयान के बाद अब आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की स्थिति और भी जटिल हो गई है, क्योंकि उन्हें अब यह साबित करना होगा कि उनकी बातों में कोई तथ्य और सच्चाई है। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों द्वारा इस मुद्दे पर हमलावर रुख अपनाया जा सकता है, और वे इसे चुनावी फायदा उठाने का एक और उदाहरण मान सकते हैं।
दिल्ली चुनाव के नजदीक आते ही यह सवाल उठने लगा है कि क्या आम आदमी पार्टी की यह मांग सिर्फ एक चुनावी हथकंडा है, या फिर यह एक वास्तविक और गंभीर मुद्दा है, जिसे भविष्य में सही तरीके से उठाया जाएगा। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यदि आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर कार्रवाई करने में गंभीर होती, तो उन्हें पहले इस प्रक्रिया को दिल्ली विधानसभा से पारित कराना चाहिए था, जैसा कि भारतीय राजनीति में इस तरह के मामलों में सामान्य रूप से होता है।
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