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32 हजार पेड़ काटने की तैयारी, जंगल पर निर्भर 150 आदिवासी परिवारों का रिकॉर्ड तक नहीं

जंगल कटने की तैयारी, 150 आदिवासी परिवारों का कोई हिसाब नहीं

32 हजार पेड़ काटने की तैयारी, जंगल पर निर्भर 150 आदिवासी परिवारों का रिकॉर्ड तक नहीं
फोटो: Tribal, Forest, Maharashtra, Society, Livelihood

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले का करजत मुंबई से करीब 70-80 किलोमीटर दूर है। यहां टोरेंट पावर का 3,000 मेगावाट क्षमता वाला पंप्ड स्टोरेज बिजली प्रोजेक्ट बनाया जा रहा है। सरकार इसे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और कोयले पर निर्भरता कम करने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। लेकिन इस परियोजना के लिए पश्चिमी घाट के जंगल में 32,490 पेड़ काटे जाने हैं, जिनमें से करीब 1,100 पेड़ काटे जा चुके हैं। इस कटाई का असर उन करीब 150 आदिवासी परिवारों पर भी पड़ सकता है, जिनकी रोजी-रोटी पीढ़ियों से इसी जंगल पर निर्भर है। हैरानी की बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में इन परिवारों की जंगल पर निर्भरता का जिक्र तक नहीं है। ऐसे में सवाल है कि जब जंगल तक उनकी पहुंच छिनने का खतरा है, तो उनके अधिकारों और आजीविका के नुकसान की भरपाई कैसे होगी? 

3,000 MW प्रोजेक्ट के लिए 32,490 पेड़ों की कटाई

टोरेंट पावर की कंपनी टोरेंट पीएसएच 3 प्राइवेट लिमिटेड करजत के साईडोंगर इलाके में 3,000 मेगावाट क्षमता का पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट बना रही है। इसके लिए 377 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है, जिसमें 233 हेक्टेयर वन विभाग की जमीन है। परियोजना के लिए 32,490 पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है। अब तक करीब 1,100 पेड़ काटे जा चुके हैं।

पंप्ड स्टोरेज तकनीक में दो जलाशय बनाए जाते हैं। बिजली की मांग कम होने पर पानी को निचले जलाशय से ऊपर पहुंचाया जाता है। जरूरत बढ़ने पर ऊपर से पानी छोड़कर टरबाइन के जरिए बिजली बनाई जाती है। सरकार का तर्क है कि इससे सौर और पवन ऊर्जा से बनने वाली अतिरिक्त बिजली को जरूरत के समय इस्तेमाल किया जा सकेगा।

जंगल ही कमाई, भोजन और इलाज का सहारा

इस जंगल के आसपास छह बस्तियों में करीब 150 परिवार रहते हैं। इनमें ज्यादातर कटकरी आदिवासी समुदाय के हैं। ये परिवार पीढ़ियों से जंगल से लकड़ी, शहद, महुआ और दूसरे फल इकट्ठा करके अपना गुजारा करते आए हैं। सूखी लकड़ी बेचकर ये रोजाना करीब 150 से 200 रुपये कमाते हैं। जंगल से उन्हें खाने-पीने की चीजें और इलाज के लिए नीम, गिलोय और अडूसा जैसी जड़ी-बूटियां भी मिलती हैं। यानी जंगल उनके लिए सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि कमाई, भोजन और इलाज का साधन भी है। पेड़ों की कटाई और जंगल तक पहुंच सीमित होने से इन परिवारों की आजीविका पर सीधा असर पड़ सकता है।

वन अधिकार कानून के बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में नाम नहीं

इस मामले में वन अधिकार कानून, 2006 का सवाल सबसे अहम है। यह कानून जंगल पर निर्भर आदिवासी और दूसरे पारंपरिक वनवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों की पहचान और मान्यता देने का प्रावधान करता है। लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पाली ग्राम सभा ने वन विभाग को इन परिवारों की जंगल पर निर्भरता से जुड़ा जरूरी रिकॉर्ड और सिफारिशें नहीं भेजीं। वन विभाग के अधिकारी समीर शिंदे के मुताबिक, ग्राम सभा को बताना था कि कितने परिवार जंगल पर निर्भर हैं और वे वहां से लकड़ी, वन उपज और औषधीय पौधे जुटाते हैं या खेती करते हैं। विभाग को इसी जानकारी के आधार पर आगे की प्रक्रिया करनी थी। रिकॉर्ड नहीं मिलने के कारण इन परिवारों के वन अधिकारों की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसका असर मुआवजे और पुनर्वास पर भी पड़ा।

पुनर्वास की जरूरत ही नहीं मानी गई

परियोजना को पर्यावरण मंजूरी देते समय यह माना गया कि किसी परिवार या गांव को वहां से हटाने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन यहां सवाल सिर्फ घरों को हटाने का नहीं है। जंगल तक पहुंच बंद होने या कम होने से भी इन परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। वन विभाग के मुताबिक, ग्राम सभा की सिफारिशें नहीं मिलने के कारण मुआवजे की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। ऐसे में जंगल पर निर्भर करीब 150 परिवारों को अपनी आजीविका के नुकसान के बदले अब तक मुआवजा नहीं मिल सका है।

विरोध के बाद पेड़ों की कटाई पर अस्थायी रोक

जंगल में पेड़ों की कटाई दशहरे की सुबह शुरू हुई थी। इसके विरोध में पांच गांवों के लोग सामने आए। प्रदर्शन में राजनीतिक नेताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया। द इंडियन एक्सप्रेस की 2 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, विरोध के बाद करीब 1,100 पेड़ों की कटाई के बाद काम रोक दिया गया। वन विभाग का कहना है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए कटाई अस्थायी रूप से रोकी गई है। इसे दोबारा कब शुरू किया जाएगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है।

सरकार और कंपनी का क्या कहना है?

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि इस परियोजना से कोयले पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। सरकार ने कटने वाले पेड़ों के बदले करीब 90 हजार पेड़ लगाने की योजना बताई है। वहीं, टोरेंट पावर ने परियोजना के निर्माण के दौरान करीब 2,000 लोगों को रोजगार देने और आदिवासी समुदाय के लिए 50 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाने का वादा किया है। कंपनी ने स्कूलों के विकास और कौशल प्रशिक्षण केंद्र शुरू करने की बात भी कही है। कंपनी के मुताबिक, महाराष्ट्र के सतारा जिले में 253 हेक्टेयर जमीन वन विभाग को दी गई है, जहां पहले से करीब 70 हजार पेड़ हैं और 30 हजार अतिरिक्त पेड़ लगाए जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि दूसरी जगह पेड़ लगाने से क्या उसी जंगल की भरपाई हो सकती है, जहां से आदिवासी परिवारों को भोजन, कमाई और इलाज के साधन मिलते हैं? 

करजत में फिलहाल पेड़ों की कटाई रुकी हुई है, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ है। एक तरफ सरकार के लिए यह बिजली और स्वच्छ ऊर्जा का प्रोजेक्ट है, तो दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी परिवारों के लिए यह उनकी पीढ़ियों पुरानी आजीविका का सवाल है। अब देखना यह है कि परियोजना आगे बढ़ने से पहले इन परिवारों के वन अधिकारों और नुकसान की भरपाई पर क्या फैसला होता है।