पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विशेष गहन जांच (SIR) पश्चिम बंगाल में जून 2025 से शुरू हुई चुनाव आयोग की विशेष गहन जांच (SIR / स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से कुल 90,83,345 नाम हटा दिए गए। इसमें घर-घर सत्यापन, तार्किक विसंगतियों (Logical Discrepancies) के आधार पर जारी नोटिस और आपत्तियों की एक लंबी प्रक्रिया शामिल थी। दिसंबर 2025 में जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से ही करीब 58 लाख नाम कम हो गए थे, जिसने राज्य की राजनीति और चुनावी निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।
सॉफ्टवेयर और ऑटो-जनरेटेड फॉर्म 7 पर उठते सवाल जांच प्रक्रिया के दौरान आयोग के सॉफ्टवेयर ने नाम की स्पेलिंग, उम्र या परिवार के सदस्यों की उम्र में विसंगति के आधार पर लाखों गड़बड़ियों को चिह्नित किया। सबसे चौंकाने वाली बात 6 मार्च 2026 को सामने आई, जब बंगाल सीईओ (Chief Electoral Officer) कार्यालय ने बताया कि 5.38 लाख 'फॉर्म 7' (किसी अन्य वोटर के नाम पर आपत्ति दर्ज कराने का फॉर्म) सॉफ्टवेयर द्वारा अपने आप (Auto-generate) बनाए गए थे। 284 विधानसभा क्षेत्रों के विश्लेषण में 5.24 लाख से अधिक प्रविष्टियों में ईआरओ (ERO) ही आपत्तिकर्ता था और नाम हटाने का कारण वाला कॉलम पूरी तरह खाली पाया गया।
न्यायिक जांच और 16 लाख अपीलों का रहस्यमय घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 24 फरवरी 2026 को करीब 60 लाख संदिग्ध मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई। 7 अप्रैल तक चली न्यायिक जांच में करीब 27.16 लाख लोगों को अयोग्य माना गया, जबकि 32.68 लाख लोगों को वैध एवं योग्य पाया गया।
विवाद तब और गहरा गया जब न्यायिक जांच में योग्य पाए गए 32.53 लाख वोटरों में से 16.81 लाख लोगों के नाम के खिलाफ अचानक अपील दाखिल कर दी गई—जिसमें से 12.15 लाख अपीलें 5 अप्रैल को एक ही दिन में दर्ज हुईं। 26 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि ये अपीलें किसी आम नागरिक या राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल सीईओ कार्यालय के अधिकारियों ने अपनी आधिकारिक हैसियत से दाखिल की थीं। ताज्जुब की बात यह रही कि केंद्रीय चुनाव आयोग और विशेष रोल ऑब्जर्वर सुब्रत गुप्ता को इसकी पूर्व सूचना ही नहीं थी।
चुनावी अधिकार, पारदर्शिता और अनुत्तरित प्रश्न अप्रैल 2026 में हुए बंगाल विधानसभा चुनावों में लाखों ऐसे नागरिक अपने मताधिकार से वंचित रह गए जिनकी अपीलें ट्रिब्यूनल में लंबित थीं। 38 लाख से अधिक कुल अपीलों में से सितंबर तक केवल 1.22 लाख का ही निपटारा हो सका। किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में होना केवल एक कागजी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि लोकतंत्र में अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुनने का संवैधानिक अधिकार है। न्यायिक रूप से योग्य ठहराए गए लोगों के खिलाफ अपील किस आधार पर और किसके आदेश पर की गई, इसकी पारदर्शिता सामने आना बेहद आवश्यक है।





