दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर भाजपा नेताओं ने रैली में कम भीड़ होने के दावे किए, तो दूसरी ओर पत्रकारों ने सवाल उठाया कि सत्ताधारी पार्टी विपक्ष की रैली को असफल साबित करने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रही है। चर्चा में रैली की भीड़, मीडिया की रिपोर्टिंग, व्यापारियों को कथित नुकसान और लोकतंत्र के मुद्दे पर विस्तार से बात हुई।
भाजपा की प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैली में भीड़ का विवाद चर्चा में शामिल पत्रकारों का कहना है कि भाजपा ने अपनी रैली और कार्यक्रमों की उपलब्धियां बताने के बजाय विपक्ष की रैली में खाली कुर्सियों के वीडियो दिखाने पर जोर दिया। उनका दावा है कि सोशल मीडिया पर साझा किए गए कुछ वीडियो अलग-अलग समय के थे। सुबह भीड़ होने और शाम को खाली कुर्सियां दिखने को लेकर भी सवाल उठाए गए।
पत्रकारों ने रामलीला मैदान, मिंटो रोड और आसपास की सड़कों पर मौजूद लोगों के आधार पर भीड़ दो से ढाई लाख से अधिक होने का अनुमान लगाया। हालांकि यह आधिकारिक गिनती नहीं थी। उनके मुताबिक राहुल गांधी के भाषण के बाद लोगों का लौटना स्वाभाविक था। रैली में वोटर लिस्ट से नाम कटने के मुद्दे पर पोस्टर, प्रतीकात्मक उंगलियां और अन्य रचनात्मक प्रदर्शन भी देखने को मिले।
मीडिया की भूमिका और रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल चर्चा में एक टीवी एंकर की रिपोर्टिंग का उदाहरण दिया गया, जिसमें सुबह उन्होंने भारी भीड़ बताई और शाम को खाली कुर्सियों की तस्वीरें दिखाईं। पत्रकारों ने आरोप लगाया कि कुछ मीडिया संस्थान राजनीतिक दलों के प्रचार की तरह काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि रिपोर्टिंग में सुबह, दोपहर और शाम की स्थिति को संदर्भ सहित दिखाना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी रैलियों में मुख्य नेता के भाषण के बाद समर्थकों का निकलना सामान्य है। बारिश के कारण मैदान में कीचड़ और पानी भरने से भी लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई थी।
व्यापारियों के नुकसान के दावे पर सवाल चर्चा में CTI की ओर से रैली के कारण 10 से 12 हजार करोड़ रुपये के नुकसान के दावे पर सवाल उठाए गए। पत्रकारों ने दिल्ली की 2024-25 की रोजाना जीएसडीपी करीब 3,300 करोड़ रुपये बताते हुए इस दावे को अवास्तविक बताया। उन्होंने कहा कि जिन बाजारों के बंद रहने की बात कही गई, उनमें कई रविवार को सामान्य रूप से बंद रहते हैं।
रिपोर्टरों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि रैली के बाद रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे दुकानदारों के यहां ग्राहक मौजूद थे। एक संतरे के विक्रेता ने कथित तौर पर अच्छी कमाई होने की बात कही। हालांकि बड़े व्यापारियों के नुकसान का स्वतंत्र आंकड़ा चर्चा में पेश नहीं किया गया।
प्रशासनिक व्यवस्था, मीडिया पास और लोकतंत्र का मुद्दा पत्रकारों ने रामलीला मैदान में सफाई और जलभराव की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि पर्याप्त समय होने के बावजूद मैदान को ठीक से तैयार नहीं किया गया। मीडिया पास को लेकर उठे विवाद पर उन्होंने कहा कि बड़ी रैलियों में सुरक्षा और सीमित जगह के कारण पास की व्यवस्था सामान्य प्रक्रिया है।
पूरी चर्चा में लोकतंत्र, संविधान, विरोध के अधिकार और SIR के जरिए मतदाता सूची में नाम हटाए जाने के मुद्दे प्रमुख रहे। वक्ताओं ने कहा कि रैली ने इन सवालों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।





