सरकार का तर्क
दिल्ली की सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों पर कथित अत्याचार के संदर्भ में, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि रील बनाने वाले और पत्रकारों के बीच कैसे अंतर किया जाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान कहा कि प्रदर्शन को कवर करने वाले कंटेंट क्रिएटर्स में पत्रकारों की पहचान करना कठिन है।
मेहता ने कहा, ''माइक के साथ कई लोग होते हैं। वे कहते हैं कि हम रिकॉर्डिंग कर रहे हैं और इसे रील में डाल देते हैं। हमें यह नहीं पता कि कौन स्वतंत्र पत्रकार है और कौन रील बनाने वाला।'' मेहता ने यह भी कहा कि सभी को इस बात पर सहमत होना चाहिए कि किसी भी महिला, जिसमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, के साथ बुरा बर्ताव नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रियाएँ
इस सुनवाई में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने संकेत दिया कि वह इस मामले की गहराई से जांच के लिए एक जांच कमेटी का गठन कर सकती है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ''गंभीर आरोप हैं और इसमें पूर्व महिला जजों एवं रिटायर्ड आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया जा सकता है।''
सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला पत्रकार को सुरक्षा भी प्रदान की है, जिसने दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। एसीपी ने महिला के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश सुनाए।
दिल्ली पुलिस को निर्देश
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्टिंग कर रही महिला पत्रकारों के साथ यौन उत्पीड़न, मारपीट और धमकाने के आरोपों के मामले में दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को 15 अक्टूबर को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहिना की पीठ ने कहा कि उन्हें इस मामले में सहायता या स्पष्टीकरण देने के लिए कोई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद होना चाहिए। यह निर्देश 'नेटवर्क ऑफ वूमेन इन मीडिया, इंडिया' की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें पत्रकारों के लिए सुरक्षा उपायों की मांग की गई थी।





