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Delhi में लोकतंत्र की धज्जियां: जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस पर पुलिसिया तांडव, पत्रकारों और छात्रों पर कार्रवाई

दिल्ली में धारा 163, पुलिसिया कार्रवाई और स्वतंत्र पत्रकारों पर हमले की विशेष रिपोर्ट।

Delhi में लोकतंत्र की धज्जियां: जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस पर पुलिसिया तांडव, पत्रकारों और छात्रों पर कार्रवाई
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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस, जनपथ और जंतर-मंतर के आसपास के इलाकों में इन दिनों सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर जिस तरह का प्रशासनिक तांडव देखने को मिल रहा है, उसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 की आड़ में पुलिस और सुरक्षा बलों ने राजधानी की सड़कों को एक अघोषित छावनी में बदल दिया है। स्थिति यह है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पहुंचे छात्र, युवा, राहगीर और यहाँ तक कि निष्पक्ष कवरेज कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

 

धारा 163 की आड़ में पुलिसिया दबंगई और रैंडम डिटेंशन

सुबह से ही दिल्ली के इन प्रमुख इलाकों में सुरक्षा बलों का भारी जमावड़ा देखा गया। प्रशासन की ओर से दावा किया गया कि चार या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक क्रूर और मनमानी साबित हुई:

  • चलती बाइक से उतारकर हिरासत: स्थिति इतनी भयावह थी कि सड़कों से गुजर रहे आम नागरिकों और यहां तक कि चलती बाइकों पर जा रहे लड़कों को भी रोककर जबरन हिरासत में ले लिया गया। उनकी गाड़ियां सड़क पर ही छोड़ दी गईं और उन्हें पुलिस वाहनों में भरकर ले जाया गया।

  • कानून के दायरे से परे कार्रवाई: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे किसी भी तरह का उपद्रव नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत सरकार से सवाल पूछने आए थे। लेकिन पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के लोगों को खदेड़ना और गिरफ्तार करना शुरू कर दिया।

 

मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों पर सीधा हमला

इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि जमीन पर सच दिखाने वाले मीडियाकर्मियों और स्वतंत्र पत्रकारों को भी पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ा:

  • रिपोर्टर्स और कैमरामैन के साथ धक्का-मुक्की: जब स्वतंत्र पत्रकार और उनके कैमरामैन पुलिस द्वारा किए जा रहे डिटेंशन की तस्वीरें कैद कर रहे थे, तब पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की, कैमरों को रोकने की कोशिश की और उनके माइक तक हटाने का प्रयास किया।

  • कानून के रखवाले बने बेलगाम: मीडियाकर्मियों ने जब विरोध किया और अपने संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया, तो पुलिस अधिकारियों और जवानों का रवैया बेहद आक्रामक और असहयोगपूर्ण रहा। यहाँ तक कि कई वकीलों और मीडिया से जुड़े लोगों को भी इस कार्रवाई में नहीं बख्शा गया।

 

छावनी में तब्दील राजधानी और जनता का आक्रोश

राजधानी की सड़कों पर जिस तरह से अर्धसैनिक बलों, पुलिस की गाड़ियों और ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसने आम जनजीवन को पूरी तरह सेस्त-व्यस्त कर दिया है:

  • बैरिकेडिंग और आवाजाही पर रोक: दिल्ली के विभिन्न सीमाओं और अंदरूनी रास्तों पर कई लेयर की बैरिकेडिंग कर दी गई है। मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक परिवहन को प्रभावित किया गया है, जिससे आम जनता को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

  • लोकतंत्र का मज़ाक: सड़क पर दौड़ते छात्र, उनका पीछा करते सुरक्षाकर्मी और बसों में ठूसे जा रहे युवाओं की इन तस्वीरों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि देश की राजधानी में कानून का राज नहीं बल्कि अघोषित आपातकाल लागू हो चुका है।

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