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क्या सच में बनने जा रहा है 'G2'? अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और भारत के सुरक्षा विकल्पों का विश्लेषण

अमेरिका-चीन G2 समझौते का डर काल्पनिक है। तीव्र द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा और सीमा पर चीन के वास्तविक खतरे को देखते हुए भारत को व्यावहारिक सुरक्षा नीति और मजबूत साझेदारियों की जरूरत है।

क्या सच में बनने जा रहा है 'G2'? अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और भारत के सुरक्षा विकल्पों का विश्लेषण
फोटो: US China G2 Competition, India Security Policy, Bipolar World Politics, India China Border Dispute, US India Strategic Partnership

G2 क्यों केवल एक भ्रम है?

G2 की अवधारणा यह मानती है कि अमेरिका और चीन आपसी मतभेद भूलकर वैश्विक व्यवस्था को मिलकर चलाएंगे। ऐतिहासिक रूप से, जब दो बड़ी शक्तियां आमने-सामने होती हैं, तो उनके बीच सहयोग की गुंजाइश बेहद सीमित होती है।

अमेरिका और सोवियत संघ के बीच भी हथियार नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सीमित समझौते हुए थे, लेकिन इसने उनके बीच के शीत युद्ध (Cold War) को खत्म नहीं किया। अमेरिका और चीन की स्थिति भी ऐसी ही है:

  • तीव्र द्विध्रुवीय मुकाबला (Bipolar Competition): दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा 'जीरो-सम गेम' (Zero-Sum Game) की तरह है, जहां एक का फायदा सीधे तौर पर दूसरे का नुकसान माना जाता है।

  • चीन की अनिश्चित आक्रामकता: चीन एक उभरती हुई शक्ति के रूप में अपने विशेष अधिकारों पर जोर दे रहा है। परिपक्वता की कमी और अत्यधिक असुरक्षा के कारण वह किसी भी राजनीतिक समझौते से दूर रहता है।

  • समान आर्थिक ताकत: सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था कभी भी अमेरिका की आधी से ज्यादा नहीं हो सकी, लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था का आकार अमेरिका के लगभग बराबर है। इसलिए दोनों में से कोई भी पीछे हटने या जल्दी थकने वाला नहीं है।

इन कारणों से, शुरुआती दौर में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र और व्यापक होगी।

भारत में 'अकेले छूट जाने' की चिंता और G2 का डर

भारत में G2 को लेकर जताई जा रही चिंता का मुख्य कारण यह डर है कि कहीं अमेरिका अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं से पीछे न हट जाए। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में साझेदार देशों का अचानक दूर हो जाना (Abandonment) कोई नई बात नहीं है।

यह दो मुख्य कारणों से होता है:

  1. घरेलू राजनीति में बदलाव: किसी देश के भीतर राजनीतिक समीकरण बदलने पर सुरक्षा समझौतों से पीछे हटना आसान हो जाता है (जैसे 1962 में सोवियत संघ द्वारा भारत का साथ न देना या 1970 के दशक में मिस्र का सोवियत संघ को छोड़कर वॉशिंगटन की ओर जाना)।

  2. क्षमता में गिरावट: जब कोई महाशक्ति कमजोर होने लगती है, हालांकि ऐसी गिरावट रातोंरात नहीं होती और इसके संकेत काफी पहले मिल जाते हैं।

भारत के सामने वास्तविक सुरक्षा चुनौतियां

भारत की सुरक्षा चिंताओं को समझते समय काल्पनिक खतरों (G2) और वास्तविक खतरों के बीच अंतर करना आवश्यक है:

  • सीमा पर मौजूद वास्तविक खतरा: भारत की सीमा सीधे चीन से लगती है, जिसके साथ सक्रिय सीमा विवाद जारी है।

  • आर्थिक और सैन्य विषमता: भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में चीनी अर्थव्यवस्था के एक-चौथाई या उससे भी कम है। भारत के पास अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की क्षमता में चीन की तुलना में काफी अंतर है।

  • सुरक्षा साझेदारी की अनिवार्यता: आदर्श स्थिति में भारत को किसी साझेदार की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह संभव नहीं है। भारत अकेले इस समय अपनी सैन्य और आर्थिक क्षमताओं के बल पर चीन को बेअसर नहीं कर सकता।

निष्कर्ष: व्यावहारिकता ही एकमात्र रास्ता

G2 जैसी काल्पनिक अवधारणाओं में उलझने से भारत का ध्यान अपनी मुख्य सुरक्षा चुनौती से भटक सकता है। अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी को कमजोर करने वाले तर्क वास्तविकता से परे हैं। भारत को अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखने के लिए काल्पनिक 'G2 मॉन्स्टर' से डरने के बजाय अपनी सीमा पर मौजूद वास्तविक खतरे पर ध्यान केंद्रित करना होगा और मजबूत सुरक्षा साझेदारियों का सही इस्तेमाल करना होगा।