चुनाव आयोग का अहम फैसला
चुनाव आयोग ने 15 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है, जिसमें पंजाब, उत्तर प्रदेश और मणिपुर जैसे चुनावी राज्यों के अंतर्गत आने वाले 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों का विशेष समरी रिवीजन किया जाएगा। यह निर्णय उस समय आया है जब 'INDIA' ब्लॉक के नेता दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और यह मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
आयोग का यह कदम राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। कई राजनीतिक दलों ने इसे महत्वपूर्ण कदम बताया है, जिससे आगामी चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकेगी।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले को अपनी बड़ी नैतिक और रणनीतिक जीत के रूप में पेश किया है। पार्टी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए कहा, "राहुल गांधी जी लंबे समय से 'मशीन रीडेबल' डिजिटल वोटर लिस्ट की मांग कर रहे थे, ताकि मतदाता सूची में धांधली और फर्जी नामों को रोका जा सके। चुनाव आयोग को विपक्ष के दबाव में आकर यह कदम उठाना पड़ा है।"
कांग्रेस का मानना है कि यह 'मशीन रीडेबल' लिस्ट चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाएगी।
मशीन-रीडेबल लिस्ट की अहमियत
'मशीन रीडेबल' PDF फॉर्मेट की विशेषता यह है कि इसमें कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा डेटा को आसानी से खोजना संभव होता है, जबकि मौजूदा 'इमेज PDF' फॉर्मेट में मैन्युअल जांच करनी पड़ती है।
कांग्रेस ने उदाहरण दिया कि बैंगलोर सेंट्रल विधानसभा क्षेत्र की स्कैन की गई लिस्ट की मैन्युअल जांच में उनकी टीम को छह महीने लगे थे, जबकि मशीन-रीडेबल लिस्ट से यह काम तेजी से और पारदर्शी तरीके से हो सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का इतिहास
मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट का मुद्दा पहले भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के समक्ष उठ चुका है। 2018 में कांग्रेस नेताओं कमलनाथ और सचिन पायलट ने 'टेक्स्ट मोड' ड्राफ्ट लिस्ट की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय कहा था कि चुनाव नियमावली में 'सर्च योग्य PDF' प्रदान करना अनिवार्य नहीं है, और चुनाव आयोग ने मतदाता की प्राइवेसी का हवाला देते हुए 'इमेज PDF' जारी करने का अधिकार रखा है।





