सीतापुर में पानी जैसी सब्जी, महोबा में बाल्टी भर पानी में दूध मिलाने का वीडियो और बिहार के स्कूलों में खाने में कीड़े मिलने की शिकायतें। देश में मुफ्त राशन से लेकर आंगनवाड़ी और मिड-डे मील तक कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन सवाल है कि भूख और कुपोषण की चुनौती अब भी क्यों बनी हुई है?
भारत में करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज दिया जाता है। छोटे बच्चों और महिलाओं के पोषण के लिए आंगनवाड़ी केंद्र हैं और सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का पका हुआ भोजन देने की व्यवस्था है। इन योजनाओं का उद्देश्य लोगों को खाद्य सुरक्षा देना, बच्चों में कुपोषण कम करना और उन्हें पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है।
इसके बावजूद ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2026 में भारत 122 देशों में 100वें स्थान पर है। भारत का स्कोर 24.1 है, जिसे रिपोर्ट में ‘गंभीर’ श्रेणी में रखा गया है। नेपाल 72वें, बांग्लादेश 84वें और पाकिस्तान 106वें स्थान पर हैं। यह रैंकिंग देश में भूख और पोषण से जुड़ी चुनौतियों पर सवाल खड़े करती है। वहीं, स्कूलों में खाने की गुणवत्ता को लेकर सामने आने वाले मामले यह पूछने की वजह देते हैं कि योजनाओं का लाभ जमीन पर किस तरह पहुंच रहा है।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति क्या बताती है?
ग्लोबल हंगर इंडेक्स दुनिया के अलग-अलग देशों में भूख और कुपोषण की स्थिति का आकलन करता है। इसे Concern Worldwide, Welthungerhilfe और IFHV संयुक्त रूप से प्रकाशित करते हैं।
इस सूचकांक में चार प्रमुख संकेतकों को देखा जाता है। पहला, आबादी का कितना हिस्सा अल्पपोषण का सामना कर रहा है। दूसरा, पांच साल से कम उम्र के कितने बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से कम है। तीसरा, कितने बच्चों का वजन उनकी लंबाई के अनुपात में कम है। चौथा, पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले कितने बच्चों की मौत हो जाती है। इसलिए भूख का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने लोगों को राशन मिल रहा है। यह भी देखना जरूरी है कि लोगों को पर्याप्त भोजन मिल रहा है या नहीं, भोजन में जरूरी पोषक तत्व हैं या नहीं और बच्चों का विकास ठीक तरह से हो रहा है या नहीं।
भारत में बच्चों के पोषण की स्थिति चिंताजनक
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2026 के भारत से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल से कम उम्र के करीब 29.3% बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से कम है। वहीं, 19% बच्चों का वजन उनकी लंबाई के अनुपात में कम है। इसके अलावा, देश की 9.8% आबादी अल्पपोषण का सामना कर रही है। बच्चों का उम्र के हिसाब से कम कद होना लंबे समय तक पोषण की कमी और विकास से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है। वहीं, लंबाई के अनुपात में कम वजन बच्चों में पोषण की गंभीर कमी की ओर इशारा करता है।
ये आंकड़े बताते हैं कि भूख का सवाल केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है। भोजन की गुणवत्ता, पोषक तत्वों की उपलब्धता और बच्चों तथा महिलाओं तक पोषण सेवाओं की पहुंच भी महत्वपूर्ण है।
80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, फिर भी पोषण का सवाल
भारत सरकार की मुफ्त अनाज योजना के तहत करीब 80 करोड़ लोगों को लाभ मिलता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आने वाले सामान्य लाभार्थियों को हर महीने प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज दिया जाता है। वहीं, अंत्योदय अन्न योजना के तहत आने वाले परिवारों को हर महीने 35 किलो अनाज मिलता है। मुफ्त राशन की योजना दिसंबर 2028 तक जारी रहेगी। यह योजना जरूरतमंद परिवारों को खाद्य सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन अनाज मिलना और परिवार के हर सदस्य को पर्याप्त पोषण मिलना एक ही बात नहीं है। संतुलित आहार में अनाज के साथ दालें, प्रोटीन, फल, सब्जियां और अन्य जरूरी पोषक तत्व भी शामिल होते हैं।
ऐसे में सवाल है कि क्या परिवारों तक पहुंचने वाला अनाज उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है? क्या उनके पास अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ खरीदने की भी क्षमता है? और क्या बच्चों तथा महिलाओं की विशेष पोषण संबंधी जरूरतें पूरी हो पा रही हैं?
आंगनवाड़ी से पोषण, फिर भी कुपोषण क्यों?
छह महीने से छह साल तक के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक पोषण की व्यवस्था है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी पोषण सेवाएं दी जाती हैं। इनके साथ स्वास्थ्य जांच और दूसरी जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है। इन योजनाओं का उद्देश्य बच्चों के विकास में मदद करना और कुपोषण को रोकना है। लेकिन बच्चों में कम कद और कम वजन के आंकड़े बताते हैं कि चुनौती अब भी बनी हुई है।
सवाल यह है कि क्या सभी जरूरतमंद बच्चों और महिलाओं तक समय पर पोषण पहुंच रहा है? क्या दिए जाने वाले भोजन की मात्रा और गुणवत्ता उनकी जरूरतों के मुताबिक है? क्या बच्चों के पोषण की नियमित निगरानी होती है और समस्या सामने आने पर समय रहते कार्रवाई की जाती है?
मिड-डे मील: बच्चों को भोजन मिल रहा है, लेकिन कैसा?
सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन देना और स्कूल में उनकी भागीदारी बढ़ाना है। लेकिन अलग-अलग राज्यों से सामने आए कुछ वीडियो और खबरें भोजन की गुणवत्ता, मात्रा और निगरानी पर सवाल खड़े करते हैं। अगस्त 2026 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के एक सरकारी स्कूल का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें बच्चों को पानी जैसी सब्जी और जली हुई रोटियां परोसे जाने की बात सामने आई। वहीं, फरवरी 2026 में महोबा के एक सरकारी स्कूल के वीडियो में रसोइया एक बाल्टी पानी में आधा-आधा लीटर के दो दूध के पैकेट मिलाती दिखाई दी। रिपोर्ट के मुताबिक, यह दूध करीब 50 बच्चों को दिया जाना था। बिहार के अरवल जिले में भी अगस्त 2026 में मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 75 स्कूलों में बच्चों के भोजन में कीड़े मिलने की शिकायत सामने आई। इससे पहले, जुलाई 2025 में मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के लालगुवाड़ी गांव के एक स्कूल में तय मेन्यू के मुताबिक खीर-पूड़ी की जगह बच्चों को सेव-परमल यानी मुरमुरे दिए जाने का वीडियो वायरल हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, मामले में अधिकारियों ने नोटिस जारी किए और संबंधित स्वयं सहायता समूह के खिलाफ कार्रवाई की खबर आई।
ये अलग-अलग जगहों पर सामने आए मामले हैं और इनके आधार पर पूरे देश की स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन ये सवाल जरूर उठाते हैं कि बच्चों के लिए भोजन का बजट, मेन्यू और व्यवस्था तय होने के बावजूद कुछ जगहों पर भोजन की गुणवत्ता और मात्रा में कमी कैसे रह जाती है? क्या स्कूलों में भोजन की नियमित जांच होती है? दूध और दूसरी खाद्य सामग्री की मात्रा और गुणवत्ता कौन सुनिश्चित करता है? भोजन तैयार करने से लेकर बच्चों की थाली तक पहुंचने के बीच निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है? और अगर कहीं लापरवाही सामने आती है, तो क्या कार्रवाई केवल वीडियो वायरल होने के बाद ही होती है? बच्चों को दोपहर का भोजन देना जरूरी है, लेकिन क्या यह सुनिश्चित नहीं होना चाहिए कि उनकी थाली में तय मानकों के मुताबिक पर्याप्त, पौष्टिक और सुरक्षित भोजन भी पहुंचे?
मिड-डे मील में बीमार पड़े बच्चे: निगरानी कितनी प्रभावी है?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल की अवधि में मिड-डे मील से जुड़ी 11 घटनाओं में 674 बच्चे बीमार पड़े। यह आंकड़ा दर्ज की गई घटनाओं पर आधारित है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि देश में ऐसी कुल घटनाएं सिर्फ इतनी ही हुईं। जिन मामलों की सूचना नहीं दी जाती या जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते, उनकी वास्तविक संख्या का आकलन करना मुश्किल है।
बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन भोजन सुरक्षित और पौष्टिक हो, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए साफ-सफाई, सुरक्षित भंडारण, भोजन की गुणवत्ता की नियमित जांच और शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए। यदि किसी स्कूल में बच्चों को खराब भोजन मिलता है या वे बीमार पड़ते हैं, तो कार्रवाई सिर्फ घटना सामने आने के बाद तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांचना जरूरी है कि चूक कहां हुई और ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए गए।
योजनाएं कई, लेकिन जवाबदेही किसकी?
मुफ्त राशन, आंगनवाड़ी और मिड-डे मील—ये तीनों व्यवस्थाएं भूख और कुपोषण से निपटने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन योजनाओं की मौजूदगी अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि हर जरूरतमंद व्यक्ति को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन मिल रहा है।
Global Hunger Index के आंकड़े बच्चों में पोषण की कमी की चुनौती दिखाते हैं। वहीं, स्कूलों के भोजन से जुड़े वायरल वीडियो और शिकायतें यह सवाल उठाती हैं कि कुछ जगहों पर भोजन की गुणवत्ता और निगरानी में कहां कमी रह जाती है।
इसलिए जरूरी है कि योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या के साथ यह भी देखा जाए कि उन्हें वास्तव में क्या मिल रहा है। क्या भोजन पर्याप्त है? क्या वह पौष्टिक और सुरक्षित है? क्या तय मेन्यू का पालन होता है? क्या शिकायतों की स्वतंत्र और नियमित जांच होती है? और क्या लापरवाही करने वालों की जवाबदेही तय की जाती है?
जब देश में करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिलता है, आंगनवाड़ी से पोषण सेवाएं दी जाती हैं और सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन मिलता है, तो फिर भारत में भूख और कुपोषण की समस्या अब भी गंभीर क्यों बनी हुई है?





