देश की राजधानी दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR - Special Intensive Revision) को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मिलकर 2 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़े राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। इस विरोध प्रदर्शन को "जंतर-मंतर 2.0" नाम दिया गया है, जो "मुख्य चुनाव 'अपराधी' का जन महाभियोग" (People’s Impeachment of Chief Election ‘Culprit’) बैनर के तले आयोजित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से उनकी कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेही तय करना है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं के गंभीर आरोप और मुख्य बिंदु:
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लोकतंत्र और मतदान के अधिकार पर प्रहार: दिल्ली में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कड़े शब्दों में कहा कि पहले नागरिकों से उनका सबसे ताकतवर लोकतांत्रिक हथियार (वोट) छीना जा रहा है, और जब जनता इस पवित्रता को बचाने के लिए सड़क पर उतरती है, तो उनके लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने के अधिकार को भी कुचला जा रहा है। आयोजकों ने स्पष्ट किया कि इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संबंध में संसद स्ट्रीट पुलिस को पहले ही पूरी सूचना दे दी गई है।
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वंचित वर्गों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन: दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. सुकुमार ने आरोप लगाया कि चल रही एसआईआर (SIR) प्रक्रिया सीधे तौर पर दलितों (SCs), आदिवासियों (STs), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) और अल्पसंख्यकों के मतदान के अधिकारों को कमजोर कर रही है। उन्होंने चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि देश भर में एसआईआर प्रक्रिया के तहत हटाए गए लगभग 13.3 करोड़ नामों में से 71 प्रतिशत (करीब 9.5 करोड़ लोग) 'अनुपस्थित, स्थानांतरित या अन्य' श्रेणियों के तहत आते हैं। उन्होंने कहा कि गरीबों और प्रवासियों से दशकों पुराने दस्तावेज़ मांगना औपनिवेशिक काल के दमनकारी कानूनों की याद दिलाता है।
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वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के कानूनी सवाल: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने कानून के दायरे से बाहर जाकर केंद्रीकृत तरीके से पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग 13 करोड़ लोगों को फॉर्म 6 भरने के लिए क्यों मजबूर कर रहा है, जबकि इसमें अवैध रूप से नई "वंश परंपरा" (Legacy) से जुड़ी शर्तें जोड़ दी गई हैं। उन्होंने देश के सभी नागरिकों से अपील की है कि वे इस लोकतंत्र की घोर लूट के खिलाफ अपने-अपने शहरों में सड़कों पर उतरकर आवाज बुलंद करें।
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राजनीतिक दलों का समर्थन और राहुल गांधी का हमला: आरजेडी सांसद मनोज झा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनावी प्रणाली में आई खामियों का 'प्रतीक पुरुष' करार दिया। वहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पर तीखा प्रहार करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलने वाली आजीवन पूर्ण कानूनी छूट (Lifelong Blanket Legal Immunity) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
विरोध प्रदर्शन की व्यापक तैयारी
यह पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानूनों और चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेदों के बीच गरमाया हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर भी एसआईआर से जुड़े फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं। अब 2 अक्टूबर के इस जंतर-मंतर प्रदर्शन के जरिए विपक्ष और नागरिक समाज सरकार पर सीधा दबाव बनाने की तैयारी में है।





