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मुलायम सिंह यादव: संघर्ष, सत्ता और अयोध्या गोलीकांड की कहानी

मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर, पांच वोटों से मुख्यमंत्री बनने की कहानी, 1984 का हमला और अयोध्या गोलीकांड से जुड़े विवाद।

मुलायम सिंह यादव: संघर्ष, सत्ता और अयोध्या गोलीकांड की कहानी
फोटो: Mulayam Singh Yadav | Uttar Pradesh Politics | Ayodhya Firing | Mandal Commission | VP Singh

गांव के अखाड़े से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव का सफर संघर्ष, संगठन, सत्ता की महत्वाकांक्षा और विवादों से भरा रहा। शिक्षक और पहलवान के रूप में शुरुआत करने वाले मुलायम ने गांवों में अपनी पकड़ के दम पर प्रदेश की राजनीति में मजबूत जगह बनाई। 1989 में मुख्यमंत्री बनने तक उनका सफर कई राजनीतिक संघर्षों और निर्णायक घटनाओं से होकर गुजरा।

मुलायम सिंह यादव ने 1967 में जसवंत नगर विधानसभा सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर पहली बार जीत हासिल की। आर्थिक तंगी के बीच उनके समर्थकों ने ‘एक नोट, एक वोट’ का नारा दिया था। हालांकि, 1969 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक खेमे के साथ काम किया और 1975 में आपातकाल के दौरान गिरफ्तार होकर करीब 19 महीने जेल में बिताए।

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश में मंत्री बनाया गया। गांवों और सहकारी समितियों में उनकी पकड़ मजबूत होती गई। 1980 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार मिली, लेकिन उन्होंने राजनीतिक संघर्ष जारी रखा।

 

1984 का हमला और राजनीतिक मजबूती

4 मार्च 1984 को इटावा-मैनपुरी सीमा के पास महीखेड़ा गांव से लौटते समय मुलायम सिंह यादव के काफिले पर गोलीबारी हुई। उनकी कार पर नौ गोलियों के निशान मिले। इस घटना में प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक छोटेलाल की मौत हो गई, जबकि नेत्रपाल गंभीर रूप से घायल हुए। मुलायम ने इसे अपनी हत्या की साजिश बताया था। उस समय वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष थे।

1985 के विधानसभा चुनाव में मुलायम जसवंत नगर से जीतकर लौटे और नेता प्रतिपक्ष बने। इस बीच चौधरी चरण सिंह की विरासत को लेकर लोकदल में संघर्ष बढ़ा। 1987 में पार्टी के विभाजन के बाद मुलायम को नेता प्रतिपक्ष का पद भी गंवाना पड़ा।

 

पांच वोटों से मुख्यमंत्री बने मुलायम

1989 में बोफोर्स विवाद और राजीव गांधी सरकार के खिलाफ असंतोष के बीच जनता दल ने उत्तर प्रदेश में 208 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सत्ता का रास्ता बनाया। मुलायम सिंह यादव और चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर मुकाबला हुआ। गुप्त मतदान में मुलायम पांच वोटों से आगे रहे और 5 दिसंबर 1989 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

उनकी सरकार में डीपी यादव जैसे विवादित नेताओं को मंत्री बनाए जाने पर बाहुबलियों को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप लगे। इसी दौरान निर्दलीय विधायक अतीक अहमद का प्रभाव भी बढ़ रहा था।

 

अयोध्या आंदोलन और सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह यादव के सामने राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद की सुरक्षा बड़ी चुनौती बन गए। विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के आंदोलन के बीच उन्होंने अयोध्या में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की। उनका चर्चित बयान था, ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।’

अगस्त 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा ने देश की राजनीति को बदल दिया। दूसरी ओर, लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और राम मंदिर आंदोलन तेज हो रहा था। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार और उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में कारसेवकों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। गोलीबारी में कारसेवकों की मौत हुई और मुलायम सरकार की भूमिका राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई। समर्थकों ने उनके कदम को विवादित ढांचे की सुरक्षा से जोड़ा, जबकि विरोधियों ने इसे कारसेवकों पर गोली चलवाने वाली कार्रवाई बताया।

इन घटनाओं ने मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक पहचान को स्थायी रूप से प्रभावित किया। उनकी पहली सरकार की कहानी सत्ता संघर्ष, सामाजिक न्याय, बाहुबल के आरोपों और अयोध्या विवाद के बीच आगे बढ़ी। इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बचाने, नई पार्टी बनाने, कांशीराम और मायावती के साथ गठबंधन तथा गेस्ट हाउस कांड जैसे घटनाक्रम उनकी राजनीति के अगले अध्याय बने।

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