नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। जंतर-मंतर को छावनी में तब्दील कर किलेबंदी कर दी गई है, जहां भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच विपक्ष का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। एक तरफ जहां सरकार की ओर से विभिन्न माध्यमों के जरिए उपलब्धियों का प्रचार किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों और 'वोट चोरी' के गंभीर मुद्दों को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है।
सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और सिविल वॉर का गंभीर आरोप
हाल ही में सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) और अन्य सहयोगी संगठनों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर देश के चुनावी ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए। इस दौरान वक्ताओं ने आरोप लगाया कि देश में एक खतरनाक माहौल तैयार किया जा रहा है और सरकार द्वारा कथित तौर पर 'सिविल वॉर' जैसे हालात पैदा करने की साजिश रची जा रही है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी मुद्दा उठाया गया कि कुछ सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर्स और असामाजिक तत्व खुलेआम धमकियां दे रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। इसके विपरीत, लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने वाले नेताओं और विपक्ष के प्रतिनिधियों पर पुलिसिया कार्रवाई की जा रही है।
उत्तर प्रदेश एसआईआर (SIR) विवाद और 16 लाख 'गायब' वोटर्स
इस पूरे विवाद की सुई उत्तर प्रदेश में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान सामने आए आंकड़ों पर आकर टिकती है। रिपोर्टों के मुताबिक, जब उत्तर प्रदेश में एसआईआर की पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट आई, तो उसमें से लगभग 2 करोड़ 89 लाख नाम हटा दिए गए थे। इसके बाद आनन-फानन में बड़े पैमाने पर फॉर्म-6 के माध्यम से नाम जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई।
हालांकि, विश्लेषकों और 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' की पड़ताल में यह बात सामने आई कि ड्राफ्ट लिस्ट आने से पहले ही बीएलओ (BLO) द्वारा घर-घर जाकर लगभग 16 लाख 18 हजार फॉर्म-6 एकत्र किए गए थे, लेकिन उनका पूरा डेटा या ऑडिट ट्रेल मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके अलावा, अंतिम सूची में जितने नए वोट जोड़े गए और कुल फॉर्म-6 की संख्या के बीच भी लाखों का भारी अंतर देखा गया। सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि जिन 3 करोड़ के करीब वोटर्स के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाए गए थे, उनमें से 96% से अधिक वोट अचानक दोबारा कैसे जुड़ गए, जो कि अन्य राज्यों की तुलना में बेहद असामान्य आंकड़ा है।
जंतर-मंतर पर किलेबंदी और विपक्ष का कड़ा रुख
इन तमाम अनियमितताओं और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच विपक्षी गठबंधन और कई छात्र संगठन लामबंद हो गए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता लगातार इस मुद्दे को मुखरता से उठा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं, जिसे लेकर विपक्ष का कहना है कि सरकार आम जनता और विपक्ष की आवाज को दबाना चाहती है।
विपक्ष और विभिन्न संगठनों की मांग है कि चुनाव आयोग इन विसंगतियों पर स्पष्टीकरण दे और मुख्य चुनाव आयुक्त को इसके लिए जवाबदेह ठहराते हुए इस्तीफा देना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि निष्पक्ष मतदान और मताधिकार की सुरक्षा का यह सवाल सीधे तौर पर भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना से जुड़ा हुआ है।
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