बैंक ने दावा किया था कि कंपनी ने किसानों के लिए जारी किए गए 97.85 करोड़ रुपये के ऋण का दुरुपयोग किया और इन धनराशियों का इस्तेमाल अन्य उद्देश्यों के लिए किया। यह मामला भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को मई 2015 तक रिपोर्ट किया गया था, और इसके बाद सीबीआई ने इस घोटाले की जांच शुरू की। जांच में 12 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें यशवंत वर्मा का नाम भी 10वें आरोपी के रूप में था। उस समय, जस्टिस वर्मा कंपनी के नॉन-एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे। हालांकि, इस मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई, और जांच धीमी गति से चलती रही। फरवरी 2024 में एक अदालत ने सीबीआई को इस मामले की जांच फिर से शुरू करने का आदेश दिया था। लेकिन इसके कुछ समय बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए सीबीआई की प्रारंभिक जांच को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया।
इस फैसले के बाद, सिम्भौली शुगर मिल्स घोटाले से जुड़े वित्तीय अनियमितताओं की जांच की संभावना खत्म हो गई।
जस्टिस वर्मा के घर से मिली नकदी ने अब उनके खिलाफ चल रही जांच को और भी पेचीदा बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, दमकल कर्मियों को उनके घर से भारी मात्रा में नकदी मिली, जिससे इस मामले ने और अधिक तूल पकड़ा। बाद में, यह मामला सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम तक पहुंच गया, जिसने जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनका ट्रांसफर नकदी बरामदगी की जांच से संबंधित नहीं है। इसके बावजूद, जज के घर से बरामद नकदी ने उनकी वित्तीय गतिविधियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे उनकी 22 सालों की बेदाग न्यायिक छवि पर भी धक्का लगा है और सिम्भौली शुगर मिल्स घोटाले में उनकी भूमिका पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है।
इस मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।
कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, "यह एक बेहद गंभीर मामला है। जस्टिस वर्मा उन्नाव बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई कर रहे थे। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि यह पैसा किसका था और इसे जज को क्यों दिया गया।" उन्होंने यह भी तंज कसा कि "दमकल विभाग अब ईडी और सीबीआई से बेहतर काम कर रहा है।" उनके इस बयान ने इस मामले में और अधिक राजनीतिक और सार्वजनिक ध्यान आकर्षित किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया है कि दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की आंतरिक जांच शुरू कर दी है, और इस जांच की रिपोर्ट आज भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सौंप दी जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। इस बीच, जस्टिस वर्मा के 22 साल के अब तक के निष्कलंक करियर पर सवाल उठने लगे हैं, और यह घटना न्यायपालिका की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर बहस छेड़ रही है। यह मामला न्यायपालिका में विश्वास और ईमानदारी पर नए सवाल खड़े करता है और न्यायिक प्रणाली की पारदर्शिता की आवश्यकता को फिर से रेखांकित करता है।
Read This Also:- जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से नकदी बरामदगी का मामला, हाई कोर्ट की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी
Read This Also:- जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से नकदी बरामदगी का मामला, हाई कोर्ट की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी





