भागवत का बयान और मदनी की प्रतिक्रिया
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में बयान दिया कि विविधता में एकता भारत के डीएनए का हिस्सा है और यह भी कहा कि मुसलमानों के प्रति नकारात्मक सोच रखने वाला कोई हिंदू नहीं हो सकता। इस बयान पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कड़ा जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि यदि भागवत अपने विचारों के प्रति गंभीर हैं, तो उन्हें भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि ऐसा करने से यह साबित होगा कि भागवत का बयान सिर्फ एकतरफा नहीं है, बल्कि वे अपने शब्दों को अमल में लाने के लिए तैयार हैं।
नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
मौलाना अरशद मदनी ने अपने एक पोस्ट में यह सवाल उठाया कि वह लोग कौन हैं जो मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि आरएसएस ने अब तक ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की है। मदनी ने कहा कि यह आवश्यक है कि भागवत नफरत फैलाने वालों से दूरी बनाएं और उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई करें।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अमेरिका में एकता और भाईचारे की बात करना सराहनीय है, लेकिन इसकी सबसे अधिक आवश्यकता भारत में है। यदि भागवत वास्तव में इस विचार को कार्यान्वित करना चाहते हैं, तो उन्हें नफरत फैलाने वालों से खुलकर दूरी बनानी चाहिए।
ओवैसी और दीपके का बयान
इस बीच, एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संघ का रुख हमेशा आम जनता और अपने कार्यकर्ताओं के लिए अलग रहा है। ओवैसी ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और पूर्व प्रमुख माधव सदाशिवराव गोलवलकर से जुड़े लेखों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि आरएसएस ने हिंदू-मुस्लिम एकता का विरोध किया है।
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके ने कहा कि भाजपा को भागवत के विचारों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने उल्लेख किया कि भागवत ने पहले कहा था कि प्रदर्शन कर रहे जेन-जी युवाओं को देश विरोधी नहीं कहा जाना चाहिए, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें 'दिमागी नक्सल' करार दिया है।





