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दिल्ली में अघोषित तानाशाही: पुलिसिया गुंडई, धक्का-मुक्की और मीडिया की आवाज़ दबाने की कोशिश

दिल्ली में पुलिसिया गुंडई, धारा 163 का दुरुपयोग और पत्रकारों पर हमलों की विशेष रिपोर्ट।

दिल्ली में अघोषित तानाशाही: पुलिसिया गुंडई, धक्का-मुक्की और मीडिया की आवाज़ दबाने की कोशिश
फोटो: Delhi Protests | Aadesh Rawal | Election Commission | Rahul Gandhi | Indian Democracy

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर इस समय लोकतंत्र का जो हाल है, उसे देखकर किसी का भी खून खौल उठे। कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में सुरक्षा के नाम पर तैनात दिल्ली पुलिस और सुरक्षा बलों का रवैया अब कानून की रक्षा करने के बजाय पूरी तरह से दमनकारी और तानाशाही भरा हो चुका है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को तो दूर, ज़मीन पर सच दिखाने की कोशिश कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों के साथ भी जिस तरह की बदसलूकी और धक्का-मुक्की की जा रही है, उसने प्रशासनिक व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है।

धारा 163 का मनमाना अर्थ और पुलिस की खुली गुंडई

प्रशासन और पुलिस अधिकारियों का दावा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत चार या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पुलिस कानून के इन नियमों का मज़ाक उड़ा रही है:

  • एक-दो लोगों पर भी कार्रवाई: जब पत्रकारों ने इंस्पेक्टर ओपी बिश्नोई और अन्य पुलिसकर्मियों से सवाल किया कि यह धारा 4-5 लोगों की गैदरिंग पर लागू होती है, तो फिर एक या दो लोगों को क्यों उठाया जा रहा है? इस पर पुलिस के पास कोई संतोषजनक कानूनी जवाब नहीं था।

  • बदतमीजी और धक्का-मुक्की: कानून का हवाला देने वाले नागरिकों और मीडियाकर्मियों के साथ पुलिसकर्मी हाथापाई पर उतर आए। कैमरों के लेंस पर हाथ मारना, माइक छीनने की कोशिश करना और प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद पत्रकारों को आगे जाने से रोकना आम बात बन गई है।

प्रेस की आज़ादी पर पहरा और अघोषित आपातकाल

घटनास्थल पर मौजूद स्वतंत्र पत्रकारों ने जब पुलिस की इस मनमानी और रैंडम डिटेंशन की लाइव तस्वीरें दिखानी चाहीं, तो पुलिस ने उन्हें घेर लिया और बलपूर्वक पीछे धकेला:

  • मीडिया को रोकने की साजिश: पुलिस यह अच्छी तरह जानती है कि उनके द्वारा की जा रही ज्यादतियां और तानाशाही देश की जनता के सामने नहीं आनी चाहिए, इसलिए मीडियाकर्मियों को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।

  • लोकतंत्र की धज्जियां: सड़क पर रोती-बिलखती युवतियों और छात्रों को जबरन बसों में भरकर ले जाया जा रहा है। एक तरफ सरकार 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' होने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ राजधानी की सड़कों पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलकर यह साबित कर दिया गया है कि जनता की आवाज़ और सवाल पूछने के अधिकार को दबाने के लिए प्रशासन किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर - https://youtu.be/e2nHNPAxxKc?si=w8CG-Unvise3KpEF

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