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कांग्रेस का दलित मुद्दे पर आक्रामक रुख: 2024 और 2029 के चुनावों की तैयारी

कांग्रेस पार्टी ने हाल में दलितों के खिलाफ अपमान को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार किया है। इस कदम के पीछे आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति है।

कांग्रेस का दलित मुद्दे पर आक्रामक रुख: 2024 और 2029 के चुनावों की तैयारी
फोटो: कांग्रेस का दलित मुद्दे पर आक्रामक रुख: 2024 और 2029 के चुनावों की तैयारी

संसद सत्र में हंगामा और कांग्रेस की प्रतिक्रिया

हाल ही में आयोजित संसद का मॉनसून सत्र बिना किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के विपक्षी हंगामे के कारण समाप्त हो गया। इस स्थिति में कांग्रेस का मनोबल ऊँचा है, हालाँकि वह उत्तराखंड के हल्द्वानी में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम के बाद हुई 'शुद्धिकरण' की घटना को लेकर आक्रामक रुख अपना रही है। खरगे ने इस घटना पर चिंता जताते हुए कहा कि यह अपमानजनक था, क्योंकि वह एक दलित हैं। इस मुद्दे पर सोनिया गांधी और खरगे ने खुद राज्यसभा के सभापति से मिलकर औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई है।


कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में खरगे ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पार्टी नेताओं की चुप्पी को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की थी। इसके एक सप्ताह बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे को उठाया, जिससे कांग्रेस ने इस विषय पर अधिक आक्रामक रुख अपनाया।


दलितों के मुद्दे पर कांग्रेस की रणनीति

खरगे के अपमान के संदर्भ में कांग्रेस की आक्रामकता केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी की नजर आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों पर है, साथ ही 2029 के लोकसभा चुनावों पर भी। आंकड़ों के अनुसार, भारत में दलितों की आबादी लगभग 16% है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या करीब 21% और पंजाब में लगभग 32 से 38% है।


कांग्रेस का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में 'संविधान खतरे में है' का नैरेटिव सफल रहा था, जिसने दलित वोटों को एकजुट करने में मदद की। अब पार्टी 'दलित खतरे में हैं' का एक बड़ा नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश कर रही है, जिससे आगामी चुनावों में दलित मतों का ध्रुवीकरण किया जा सके।


चुनौतियाँ और भाजपा का पलटवार

कांग्रेस के लिए इस नैरेटिव को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। दलितों के इस सियासी मैदान में बहुजन समाज पार्टी (BSP) एक मजबूत खिलाड़ी है, जबकि चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी तेजी से उभर रही है। इसके अलावा, भाजपा ने भी कांग्रेस के इस नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए अपने तर्क तैयार कर लिए हैं। भाजपा का कहना है कि दलितों को केवल एक वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव के उन तक पहुँच रहा है।


उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। लगभग 140 से 150 सीटों पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं, पंजाब में अनुसूचित जाति के लिए 34 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, दलित मतदाता 50 से अधिक सीटों पर हार-जीत तय करते हैं।