पीठ ने कहा, "पर्यावरण संरक्षण के मामलों में किसी प्रकार की दया नहीं होनी चाहिए। बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई, मानव हत्या से भी जघन्य अपराध है।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना अनुमति के काटे गए 454 पेड़ों से जो हरित क्षेत्र नष्ट हुआ, उसे दोबारा उगने में कम से कम 100 साल लगेंगे। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की सिफारिश को स्वीकार करते हुए शिवशंकर अग्रवाल नामक व्यक्ति पर कठोर आर्थिक दंड लगाया।
हालांकि, अग्रवाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने गलती स्वीकार करते हुए दंड में राहत की मांग की, लेकिन अदालत ने इसे ठुकरा दिया।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के अपने उस आदेश को भी वापस ले लिया जिसमें ‘ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन’ के भीतर गैर-वन और निजी भूमि पर पेड़ों की कटाई के लिए अनुमति की आवश्यकता को हटा दिया गया था।
लोकसभा में उठा इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश की टिप्पणी का मुद्दा
इस बीच, भारतीय जनता पार्टी के सांसद मुकेश राजपूत ने लोकसभा में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश की विवादित टिप्पणी का मुद्दा उठाया। न्यायाधीश ने हाल ही में दिए अपने आदेश में कहा था कि "लड़की के केवल निजी अंग को पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार का अपराध नहीं है।"
फर्रुखाबाद से लोकसभा सांसद मुकेश राजपूत ने सदन के शून्यकाल में इस मुद्दे पर विरोध जताते हुए कहा कि यह टिप्पणी न केवल देश के 140 करोड़ लोगों की भावनाओं को आहत करती है, बल्कि इससे महिलाओं में असुरक्षा की भावना भी बढ़ती है। उन्होंने सरकार से मांग की कि "ऐसे लोगों के खिलाफ संविधान के दायरे में सख्त कार्रवाई की जाए और देश की महिलाओं से माफी मांगी जाए।"
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